भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें ‘प्रिय मित्र’ कहा। चीनी नेता शी जिनपिंग ने एक कदम और आगे बढ़ते हुए उन्हें अपना ‘सबसे अच्छा और करीबी दोस्त’ कहा।
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के यूक्रेन पर हमले ने एशियाई शक्तियों के साथ रूस के संबंधों पर नए सिरे से चर्चा शुरू कर दी है। यूक्रेन पर रूस के छेड़े गए युद्ध के खिलाफ में चीन और भारत दोनों ने रूस की निंदा करने से इनकार कर दिया। वहीं दोनों देशों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और महासभा के प्रस्तावों पर मतदान से परहेज किया है, जिसमें मास्को से यूक्रेन पर अपने हमले को तुरंत रोकने की मांग की गई थी। जबकि दुनिया के दो सबसे बड़ी आबादी वाले दोनों देशों को इस मुद्दे पर बोलने के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना करना पड़ रहा है।
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सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका और यूरोप में ने जहां इस हमले को लेकर अपनी तेज प्रतिक्रिया दी और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता और कानून के शासन को बनाए रखने के लिए रूस के खिलाफ एक व्यापक वैचारिक लड़ाई शुरू कर दी वहीं एशिया की इन दो प्रमुख शक्तियों भारत और चीन ने अपने स्वयं के हितों का ध्यान रखा।
भारत ने किसी दबाव की परवाह किए बगैर इस मुद्दे पर एक खास रुख अपनाया हुआ है जिसके तहत वह संघर्ष वाले इलाकों में तत्काल युद्धविराम की अपील कर रहा है। ऐसे में यह देखना जरूरी होता है कि रूस के साथ चीन और भारत के रिश्ते कैसे हैं?
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चीन और रूस
सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक रूस यूक्रेन पर हमले की तैयारी के मद्देनजर कुछ हफ्ते पहले से उसकी सीमा पर अपनी सैनिकों की तैनाती कर रहा था तो जिनपिंग और पुतिन ज्यादा करीब नहीं लग रहे थे। लेकिन जैसे ही बीजिंग विंटर ओलंपिक शुरू हुआ और पुतिन बीजिंग पहुंचे और इस जोड़ी ने कहा कि रूस और चीन के संबंधों की ‘कोई सीमा नहीं है।’ बीजिंग का विंटर ओलंपिक खत्म होने के तुरंत बाद रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया।
इसके बाद इस बात पर सवाल उठाए जा रहे हैं कि जिनपिंग, यूक्रेन पर हमला करने के पुतिन की योजनाओं के बारे में कितना जानते थे? एक पश्चिमी खुफिया रिपोर्ट में कहा गया कि चीनी अधिकारियों ने फरवरी की शुरुआत में वरिष्ठ रूसी अधिकारियों को बीजिंग ओलंपिक खत्म होने तक यूक्रेन पर हमला करने के लिए इंतजार करने को कहा था। हालांकि रूस ने इस रिपोर्ट का खंडन किया है।
शी जिनपिंग-व्लादिमिर पुतिन
- फोटो : PTI
हालांकि इससे पहले दिसंबर 2021 में भी पुतिन और चीन के नेता जिनपिंग के बीच वीडियो कॉल के जरिए बातचीत हुई थी। बैठक के बाद रूसी राष्ट्रपति के कार्यालय ने एक बयान में कहा है कि रूस-चीन संबंध अप्रत्याशित रूप से सकारात्मक हो गए हैं।
साझा लक्ष्य, साझा दुश्मन
दोनों देशों ने पिछले साल द्विपक्षीय व्यापार में 146 बिलियन डॉलर का रिकॉर्ड तोड़ दिया और बड़े पैमाने पर संयुक्त सैन्य अभ्यास के साथ संयुक्त प्रशिक्षण की परंपरा भी जारी रखी। दोनों देश करीब 4,000 किलोमीटर यानी 2,458 मील की सीमा साझा करते हैं और चीन रूस का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। लेकिन उनके बीच के संबंधों के पीछे की असली वजह दोनों के वाशिंगटन के साथ उनके आपसी तनाव हैं। दोनों के साझा लक्ष्य, साझा दुश्मन हैं और जिनके निशाने पर अमेरिका है। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान अब उनके तथाकथित असीम संबंधों की परीक्षा हो रही है।
रूस पर प्रतिबंध लगाने से चीन ने खड़े किए हाथ
रूस के साथ रिश्ते को देखते हुए चीन ने रूसी हमले की निंदा करने से इनकार कर दिया है और उसने कहा कि वह मास्को कि ‘वैध सुरक्षा चिंताओं’ को समझता है। रूस पर लगाए गए पश्चिमी देशों के प्रतिबंध के सिलसिले में पिछले बुधवार को चीन बैंकिंग और बीमा नियामक आयोग के अध्यक्ष गुओ शुकिंग ने कहा कि चीन इस तरह के किसी भी प्रतिबंध का हिस्सा नहीं होगा।
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की
- फोटो : सोशल मीडिया
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि ऐसा करने से चीन को पश्चिम के साथ अपने संबंधों में और भी कड़वाहट का सामना करना पड़ सकता है। यूक्रेन पर रूस के आक्रमण ने पश्चिमी सहयोगियों को एकजुट कर दिया है और दूसरी तरफ उनकी चिंता ताइवान पर चीन के रुख को लेकर भी हो गई है।
यूक्रेन को भी साधे रखना चाहता है चीन
हालांकि बीजिंग के यूक्रेन से भी संबंध हैं, जो चीन को अपना सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार मानता है। यूक्रेन 2017 में शी के प्रमुख बेल्ट एंड रोड इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास पहल में शामिल हुआ और पिछले साल यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने यूक्रेन को चीन के लिए ‘यूरोप का पुल’ कहा।
यूरोप के लिए मालगाड़ियां यूक्रेन के माध्यम से चलती हैं और देश चीन के लिए मकई और जौ जैसे उत्पादों का एक प्रमुख स्रोत रहा है। लिहाजा चीन यूक्रेन के साथ भी रिश्ते को बनाए रखना चाहता है। पिछले हफ्ते अपने यूक्रेनी समकक्ष के साथ एक कॉल में चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने कहा कि चीन इस संघर्ष से ‘गहरे दुख में’ है।
रूस के राष्ट्रपति पुतिन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।
- फोटो : अमर उजाला
भारत और रूस के कैसे रिश्ते?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मशहूर पत्रकार करण थापर को अभी हाल में दिए गए एक साक्षात्कार में भारत के पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन ने कहा है, 'भारत की कूटनीति के लिए यह सबसे मुश्किल दौर है। भारत के लिए चुनौती है कि कैसे पश्चिम को नाराज किए बिना रूस को भी साथ रखे।
रूस के साथ अगर हमारे रिश्ते बेहद खास और रणनीतिक स्तर के हैं। जब रूस के साथ भारत के संबंधों की बात आती है तो उसके केंद्र में चीन भी होता है जो एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। वहीं भारत इस प्रभाव का मुकाबला करने का प्रयास कर रहा है और इसलिए रूस के करीब रहना चाहता है। इसका एक संकेत क्वाड में भारत की भूमिका से मिलता है। जिसमें अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर भारत ने एक अनौपचारिक सुरक्षा समूह बनाया है और हाल ही में काफी सक्रिय हो गया है।
विरोध नहीं करने की वजह रक्षा संबंध भी
सीएनएन की रिपोर्ट में कहा गया है कि रूस के साथ भारत के रक्षा संबंध है और रूस का विरोध नहीं करने की एक बड़ी वजह यह भी है। भारत ने एक हवाई रक्षा मिसाइल प्रणाली के लिए 2018 में रूस के साथ 5 बिलियन डॉलर के हथियारों का सौदा किया था। अनुमान है कि भारत के 50 फीसदी से अधिक सैन्य उपकरण रूस से आए हैं।
चीन के साथ सीमा पर भारत के चल रहे तनाव को देखते हुए यह उपकरण महत्वपूर्ण है। भारत के पाकिस्तान के साथ भी तनावपूर्ण संबंध हैं और पाकिस्तान चीन के करीब जा रहा है यह भारत के लिए चिंता का गंभीर विषय बनता जा रहा है।
चीन के सामने खड़े होने के लिए रूस की जरूरत
किंग्स कॉलेज लंदन में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर और नई दिल्ली में ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में सामरिक अध्ययन कार्यक्रम के प्रमुख हर्ष वी पंत के एक बयान के मुताबिक ‘भारत को चीन के सामने खड़े होने के लिए रूस की जरूरत है। इसे रूस के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों को पश्चिम के साथ अपने बढ़ते संबंधों के साथ संतुलित करना होगा।’
रूस और भारत के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों का एक लंबा इतिहास रहा है, जो सोवियत संघ के जमाने से है। यूएसएसआर ने भारत को पाकिस्तान के साथ 1971 के युद्ध में जीत दिलाने में मदद की थी। पुतिन और मोदी के बीच भी उत्साहजनक संबंध हैं। पुतिन पिछले साल दिसंबर में एक संक्षिप्त दौरे पर दिल्ली दौरे पर आए थे।
भारत स्वयं के हितों के बारे में सोच रहा
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कूटनीति और निरस्त्रीकरण विषय के असिस्टेंट प्रोफेसर हैप्पीमन जैकब के मुताबिक भारत, यूक्रेन के हालात को उस देश के साथ अपने संबंधों के संदर्भ में नहीं देख रहा है, बल्कि वह अपने स्वयं के खतरों के बारे में सोच रहा है। जैकब के मुताबिक यह पश्चिम के खिलाफ जाने या रूस का समर्थन करने के बारे में नहीं है। भारत को अधिक सावधानी से सूक्ष्म दृष्टिकोण अपनाना होगा।
कई मीडिया रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि अब तक भारत दोनों पक्षों को संतुष्ट करने की कोशिश कर रहा है। मोदी ने जेलेंस्की और पुतिन दोनों के साथ बात की है और यूक्रेन के लिए मानवीय सहायता का वादा किया है। पीएम मोदी मोदी ने रूस के हमलों की स्पष्ट रूप से निंदा नहीं की है। उन्होंने पुतिन के साथ बातचीत में ‘हिंसा की तत्काल समाप्ति’ और ‘सभी पक्षों से ठोस प्रयास’ करने का आह्वान किया।