पहले हुए कुछ अध्ययनों का ये निष्कर्ष रहा था कि गैस और तेल उद्योग पर सरकारी नियंत्रण बढ़ने के साथ ही पुतिन का रसूख बढ़ा है। 2004 आते-आते पुतिन सरकार रूस के तेल और गैस उत्पादन पर अपना प्रभाव निर्णायक रूप से बढ़ा चुकी थी। तेल और गैस से हुई आमदनी का इस्तेमाल पुतिन सरकार ने रूस की सैनिक ताकत बढ़ाने में किया।
साथ ही पड़ोसी देशों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर वे उन्हें रूस के प्रभाव क्षेत्र में ले आए लेकिन पश्चिमी यूरोप में उनका ऐसा प्रभाव अब तक नहीं है। इसीलिए नॉर्ड स्ट्रीम-2 पाइपलाइन तैयार होने को उस क्षेत्र में इतनी अहमियत दी गई है।
पाइपलाइन पर नाटो के सदस्य देशों में मतभेद
इस पाइपलाइन को लेकर उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के सदस्य देशों में पहले ही गहरे मतभेद खड़े हो चुके हैं। पोलैंड, स्वीडन, लिथुआनिया, एस्तोनिया और लातविया गहरी चिंता जता चुके हैँ। उनका कहना है कि रूस इस पाइपलाइन की सुरक्षा के नाम पर अपनी नौ सेना को बाल्टिक सागर में तैनात कर सकता है। उससे पश्चिमी यूरोप में रूस की खुफिया सूचना जुटाने की ताकत भी बढ़ जाएगी।
गौरतलब है कि पुतिन नाटो को रूस की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती मानते हैँ। विश्लेषकों का कहना है कि नाटो और बाकी यूरोपीय देशों में मतभेद होना सीधे तौर पर रूस के लिए फायदे की बात है। इससे पुतिन को वहां अपनी कूटनीतिक पहल करने का मौका मिलेगा।
यूक्रेन पर बढ़ सकता है रूस का दबदबा
इसके अलावा अब रूस को यूरोप तक गैस पहुंचाने का एक ऐसा रास्ता मिल जाएगा, जो यूक्रेन की सीमा से होकर नहीं गुजरेगा। अब तक रूस को अपने इस विरोधी देश के सीमा क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए यूरोप तक गैस भेजनी पड़ती थी। इसके बदले उस यूक्रेन को तीन अरब डॉलर का सालाना भुगतान करना पड़ता था। आशंका है कि यूक्रेन के ये आमदनी अब खत्म हो जाएगी। इससे यूक्रेन पर उसका दबदबा भी बढ़ेगा। ये पश्चिमी देशों के लिए अच्छी खबर नहीं है। लेकिन पुतिन की गैस कूटनीति के आगे वे फिलहाल दिग्भ्रमित नजर आ रहे हैँ।