रूस में अब मायूसी का माहौल बनने लगा है। बीते 24 फरवरी को जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन के खिलाफ ‘विशेष सैनिक कार्रवाई’ का एलान किया, तो देश में आम समझ यही थी कि यह एक छोटी अवधि की कार्रवाई होगी। एक राय यह भी जताई गई थी कि इस कार्रवाई के मद्देनजर पश्चिमी देश रूस की सुरक्षा संबंधी मांगों पर विचार करने के लिए तैयार हो जाएंगे। लेकिन इसके उलट पश्चिमी देशों ने बेहद सख्त रुख अपना लिया। उधर यूक्रेन पर निकट भविष्य में पूरा कब्जा होने के कोई संकेत नहीं दिखाई दे रहे हैं।
देश में बदलते माहौल के बीच कुछ रूसी विशेषज्ञ लोगों को आश्वस्त करने की कोशिश कर रहे हैं। उन विशेषज्ञों ने कहा है कि जब पुतिन ने कार्रवाई का एलान किया, तब उन्हें आने वाली चुनौतियों का पूरा अंदाजा था। रूस की रक्षा पत्रिका अर्सनल ऑफ द फादरलैंड से जुड़े विश्लेषक अलेक्सी लिओनकोव ने कहा है- ‘रूस इस बात को समझता है कि हथियारों से कितना कुछ हासिल किया जा सकता है। लेकिन अगर आप इस हद को पार करेंगे, तो उससे कहीं बदतर स्थिति पैदा हो जाएगी, जितनी युद्ध न करने पर बनती।’
रूस के अकेडेमी ऑफ मिलिटरी साइंसेज में प्रोफेसर वेदिम कोजियुलिन के मुताबिक रूस को हवाई हमलों से मदद जरूर मिली है, लेकिन वह उनके जरिए यूक्रेन के सैनिकों का मनोबल गिराने में नाकाम रहा है। उन्होंने वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम से कहा- ‘यूक्रेनी सेना की युद्ध क्षमता कायम है, हालांकि उसके सैन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर का एक बड़ा हिस्सा नष्ट हो गया है।’ उन्होंने कहा कि यूक्रेनी सेना का संचार नेटवर्क अभी भी काम कर रहा है, जिसका मतलब है कि रूस के सभी सैनिक निशाने सफल नहीं रहे हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि जब बड़ी आबादी वाले इलाकों पर कब्जा जमाने की बात आएगी, तो रूसी सेना की चुनौती बढ़ जाएगी। लियोनकोव के मुताबिक रूसी सेना अब तक शहरों पर हमला करने से बचती रही है। इसके बदले उसका ध्यान इस पर रहा है कि उन शहरों के सप्लाई लाइन को काट दिया जाए। हालांकि रूसी सेना ने कुछ आबादी वाले इलाकों पर भी हमले किए हैं।