जिम्बाब्वे में हुए तख्तापलट के बाद दक्षिण अफ्रीका के रक्षा मंत्री, राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे और सेना के उन जनरलों से मिल सकते हैं जिन्होंने मुगाबे को घर में नजरबंद कर रखा है। सूत्रों के मुताबिक मुगाबे कुछ शर्तों पर अड़े हुए हैं। हालांकि जिम्बाब्वे में कोई भी मुगाबे को उनके पद पर देखना नहीं चाहता।
बर्खास्त किए गए उपराष्ट्रपति इमरसन मनंगावा के गद्दी संभालने की पूरी संभावना है। वहीं मुख्य विपक्षी पार्टी एमडीसी का कहना है कि वह अंतरिम सरकार का हिस्सा बनने पर विचार करेगी।
सेना ने कहा यह तख्तापलट नहीं है
जिम्बाब्वे की सेना का कहना है कि उनकी कार्रवाई तख्तापलट नहीं है। सेना अभी भी रॉबर्ट मुगाबे को कमांडर-इन-चीफ बता रही है, लेकिन मुगाबे के हाथ में कमान होती तो सेना के पास जब चाहे तब पासा पलटने का अधिकार कैसे होता।
परिभाषा के हिसाब से शायद इसे 100 फीसदी तख्तापलट न कहा जा सके, लेकिन जमीनी तौर पर इसका असर कमोबेश वैसा ही है। अफ्रीका में अब तक जो होता आया है उसके हिसाब से सरकारी टीवी पर कब्जा करना, सड़कों और हर अहम रास्ते पर सेना की मौजूदगी और राष्ट्रपति भवन में जबरदस्ती घुसना - ये सभी तख्तापलट की तरफ इशारा करते हैं। बस एक काम जो नहीं किया गया है - वह है संविधान को बर्खास्त करना।
तख्तापलट कहने से डरती है सेना
अफ्रीका में लोकतंत्र को मजबूत करने की कोशिशों के चलते सेना हिंसक तरीके से तख्तापलट करने से बचती है। यही वजह है कि अतीत में हुई ऐसी घटनाओं के दौरान तख्तापलट के बाद जल्दी ही चुनाव कराने, लोकतांत्रिक तरीके से सरकार बनाने या सत्ता परिवर्तन के बारे में बातचीत करने के वादे किए गए।
जिम्बाब्वे की सेना ने अभी तक ऐसा कोई इशारा नहीं किया है जिससे लगे कि वह अब सरकार चलाना चाहती है। माना जा रहा है कि सेना के पास इस काम के लिए एक आदमी है। हाल ही में पद से हटाए गए उपराष्ट्रपति इमरसन मनंगावा सेना के बड़े चहेते बताए जाते हैं।
ये भी पढ़ेंः जानें कैसे पता चलता है कि तख्तापलट हुआ है?
पत्नी के उकसाने पर पद से हटाया
इमरसन ने जिम्बाब्वे की आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी। 1980 में उन्होंने रोडेशिया के बचे हुए सुरक्षा बलों, जिम्बाब्वे अफ्रीकन नेशनल लिबरेशन आर्मी और जिम्बाब्वे पीपल रेवॉल्यूशनरी आर्मी को मिलाकर जिम्बाब्वे नेशनल आर्मी का गठन किया।
उन्हें राष्ट्रपति मुगाबे का स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाता था।लेकिन मुगाबे ने पिछले हफ्ते पत्नी ग्रेस मुगाबे के उकसाने पर मनंगावा को बर्खास्त कर दिया था। ग्रेस सियासी महत्वाकांक्षाएं रखती हैं और सार्वजनिक रूप से मनंगावा की मुखालफत कर चुकी हैं।
लेकिन ग्रेस को जिम्बाब्वे की सेना का समर्थन हासिल नहीं है। जिम्बाब्वे की सेना आजादी की विरासत और उसमें शामिल लोगों का ज्यादा सम्मान करती है।
क्या इस बार ज्यादा आगे निकल गए मुगाबे?
सेना अब तक मुगाबे की सरकार का साथ देती रही क्योंकि वे भी स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा रहे हैं। मुगाबे ने 2014 में भी पूर्व उपराष्ट्रपति जोइस मुजुरु को बर्खास्त कर दिया था। मुजुरु भी स्वतंत्रता सेनानी रहे थे, लेकिन तब सेना ने ऐसी प्रतिक्रिया नहीं दी थी। लेकिन इस बार शायद मुगाबे कुछ ज्यादा ही आगे निकल गए।