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मुलाहिजा फरमाएं, ट्वीट किया है!

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मिर्जा गालिब की सहेली उर्दू अब सोशल मीडिया की भी सहेली है। उर्दू शायरी अब फेसबुक पर धड़कती है और ट्विटर पर चहकती है। इस नए ठिकाने पर उसके हजारों दोस्त हैं और लाखों चाहने वाले।
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राना सफवी इन्हीं में एक हैं, जिन्होंने एक साल पहले हैशटैग शायर के साथ एक ट्वीट हैंडल @shairoftheday शुरू किया। जो ट्विटर पर शायद सबसे मशहूर और सक्रिय ग्रुपों में एक है। जहां लोग शायरी की बारीकियों का मजा लेते हैं।

यूं तो ट्विटर पर हर शायर का हैंडल मौजूद है, जैसे मिर्ज़ा ग़ालिब, साहिर लुधियानवी, जिगर मुरादाबादी, अकबर इलाहाबादी और नए शायरों में वसीम बरेलवी, निदा फ़ाज़ली आदि।
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'अस्पताल में तीन महीने #शायर के साथ'
राना सफ़वी के मुताबिक वो इसलिए लोकप्रिय नहीं हो पा रहे क्योंकि पूरे ग्रुप को लेकर चलना होता है और अब उनका ट्वीट हैंडल एक परिवार की शक्ल ले चुका है।

राना सफ़वी ने बताया, ‘एक बार जयपुर से एक शख्स महेश पारीख का ट्वीट मेरे पास आया कि मैं अस्पताल में था और तीन महीने मैंने शायर के ट्वीट पढ़कर गुजारे हैं’

राना सफ़वी दुबई में रहती हैं मगर उनके ट्वीट हैंडल के फॉलोअर दुनिया के तकरीबन हर हिस्से में हैं। हर रविवार को वो शेड्यूल बनाती हैं कि इस बार किस शायर के बारे में चर्चा होगी। हर सुबह वह अपना स्टेटस अपडेट करती हैं।

राना सफ़वी के मुताबिक़ उनके ट्वीट हैंडल पर ग़ालिब की डिमांड बहुत ज्यादा है, लेकिन हम उन्हें तीन महीने से पहले दोबारा नहीं रखते। यहां तक कि 2011 में ग़ालिब की सदी के आयोजन के दौरान उन्होंने ट्रेंड कराने के लिए ग़ालिब के 500 शेर ट्वीट किए थे। उनके अलावा सभी ने 100 से 400 शेर तक शेर ट्वीट किए थे।

'अदब का लोकतंत्रीकरण किया ट्विटर ने'
शायर ऑफ द डे के फॉलोअर आनंद पांडे यूं तो एक बड़ी कंपनी में काम करते हैं लेकिन ट्विटर पर उर्दू शायरी की दुनिया में भी दखल रखते हैं।

आनंद पांडे कहते हैं, ‘ये मेरी दौलत है जो मुझे ट्विटर के जरिए मिली है। मैं कई शायरों के नाम भी नहीं जानता था। कई को लेकर मेरे पूर्वाग्रह थे। जबसे ट्विटर पर मैंने शायरी पर बातचीत में हिस्सा लिया तो मेरी समझ का विस्तार हुआ और गहराई बढ़ गई।’

आनंद पांडे के मुताबिक उर्दू के ट्विटर को मकाम बनाने के बाद दो चीजें हुईं- एक तो अदब का लोकतंत्रीकरण हुआ। दूसरे ये जगह हिंदू-मुस्लिम और हिंदी बनाम उर्दू की रूढ़िवादिता से आज़ाद हो गई है। उनके लफ़्ज़ों में ये एक चौक है जहां साहित्यप्रेमी आते हैं और बातचीत करके चले जाते हैं।

'शायरी सिर्फ बुजुर्गों का काम नहीं'
सोशल मीडिया के इसी चौक पर आपको कई क्लासिकी और मौजूदा शायरों के पन्ने मिलेंगे। इनमें एक हैं- जाने-माने शायर वसीम बरेलवी, जिनके ट्विटर पर मुरीद खासी तादाद में हैं। वसीम बरेलवी सोशल मीडिया पर शायरी के बढ़ते कदमों को इन्क़लाब का दर्जा देते हैं।

वसीम बरेलवी कहते हैं, ‘मीर के जमाने में शायरी दिल्ली से रामपुर और लखनऊ का सफर दो-ढाई महीने में तय करती थी। आज सूरतेहाल यह है कि इधर आपके मुंह से बात निकली और उधर सारी दुनिया में पहुंच गई। पहले हम समझते थे कि शायरी तो उमररसीदा लोगों की चीज है, लेकिन नहीं, नई पीढ़ी किस-किस तरह शायरी तक पहुंचने की कोशिश कर रही है, ये खुशआईन बात है। और ऐसी पीढ़ी भी कोशिश कर रही है जिसकी जबान उर्दू नहीं।’

ये बात और है कि वसीम बरेलवी खुद गाहे-बगाहे ही फेसबुक और ट्विटर का चक्कर लगाते हैं। हालांकि कई नौजवान शायरों के लिए अपने मुरीदों तक पहुंचने का इससे बेहतर प्लेटफार्म नहीं।

'शायरी कोई वन-डे क्रिकेट नहीं'
शायर मोइद रशीदी के मुताबिक़ ऑनलाइन पब्लिसिटी का ज़रिया है सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म। यह किताब की सूरत में नहीं है, पर इंटरनेट पर आ गई है। उनका कहना है कि इस माध्यम में चीजों को अस्थायी नहीं कहा जा सकता। वहां मौजूद वर्ग शेरो-शायरी का पूरी तरह आनंद लेता है, उस पर कमेंट करता है और उससे लगातार जुड़ा रहता है।

नए शायरों के विपरीत स्थापित शायरों में एक मुनव्वर राना को ट्विटर की ताक़त से तो इनकार नहीं, पर वह खुद इसमें वक्तज़ाया नहीं करना चाहते। उनके मुताबिक उनका काम सृजनात्मक है और वह चाहते हैं कि उनके लिखे हुए का स्थायी महत्व हो। चाहे फिर उसे सदी बाद ही क्यों न पढ़ा जाए।

मुनव्वर राना ने कहा, ‘असल में ट्विटर एक नशा है। नशा है इसलिए कि हम उसका रेस्पांस चाहते हैं। यह उन लोगों के लिए अच्छा है जो शोहरत की बुलंदी पर बैठना चाहते हैं। हमारा काम क्रिएट करना है। हम लोग तो लिखने-पढ़ने वाले लोग हैं। जरूरी नहीं कि हमारा लिखा आज ही पढ़ा जाए क्योंकि शायरी कोई वनडे क्रिकेट नहीं है। इसलिए हमें उसे लोगों तक पहुंचाने की जल्दबाज़ी नहीं।’

ट्विटर पर काफी पसंद किए जाने वाले शायर निदा फ़ाज़ली को खुद इस मीडियम में यकीन नहीं है। वह कहते हैं कि उर्दू सियासत का खिलौना बना दी गई है और बाजार में भी उसकी अहमियत नहीं है।

इसके लिए फ़ाज़ली हिंदी सिनेमा का उदाहरण सामने रखते हैं। ‘उर्दू बाजार में नहीं है। बंबई में कब्रिस्तान है जिसने मधुबाला, मोहम्मद रफ़ी और साहिर भी दिए हैं। बाजार जब तराजू लेकर पहुंचा तो पता चला कि मधुबाला के चेहरे की कीमत ज्यादा है तो उनकी कब्र मार्बल की हो गई। रफी की आवाज की कीमत ज्यादा थी तो उनकी कब्र ग्रेनाइट की हो गई और साहिर की कब्र शब्दों की थी तो पांच बरसातों के बाद ही वह जमीन बन गई।’

'सोशल मीडिया पाठ्यक्रम का हिस्सा बने'
उर्दू की तालीम देने वाले क्या सोचते हैं? यह जानने के लिए बीबीसी ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग के प्रमुख प्रोफेसर तौकीर अहमद से बात की। प्रोफेसर तौकीर अहमद ने उर्दू के सोशल मीडिया से रिश्तों की पुरजोर तरफदारी की। यहां तक कि उनका कहना था कि इसे पाठ्यक्रम का हिस्सा भी बनाया जा सकता है।

प्रोफेसर तौकीर के मुताबिक सोशल मीडिया पर उर्दू शेरो-शायरी को आगे बढ़ाने वाले हालांकि उर्दू रसमुल खत (लिपि) का इस्तेमाल नहीं करते लेकिन इसके बावजूद वह उर्दू ही होती है। इसके ज़रिए नई पीढ़ी उर्दू के क्लासिकी शायरों के बारे में जानने की कोशिश कर रही है। उनका कहना है कि उनका काम है कि उर्दू शब्दों के उच्चारण का सही ज्ञान दें।

दिल्ली विश्वविद्यालय में ही असिस्टेंट टीचर अफसाना हयात इकबाल पर शोध कर रही हैं। उनका कहना है कि उर्दू को उसकी पहचान चाहिए। अफसाना हयात के मुताबिक सोशल मीडिया उसे इस पहचान के संकट से उबार सकता है मगर वहां उर्दू के लफ़्ज़ों के सही इस्तेमाल पर जोर नहीं होता।

'140 करेक्टर में फिट बैठता है शेर'
क्या उर्दू शायरी किताबों से निकलकर वर्चुअल दुनिया में अपना सही मकाम हासिल कर सकती है। बीबीसी हिंदी में सोशल मीडिया का काम संभाल रहे सुशील झा के मुताबिक ट्विटर ने उर्दू शायरी को वो इकोनॉमी मुहैया कराई है, जिसमें एक शेर 140 करेक्टर में बखूबी अपनी जगह बना लेता है।

सुशील झा कहते हैं, ‘ट्विटर पर एक बाध्यता होती है कि 140 करेक्टर में ही जाना है, और उर्दू के शेर भी ऐसे ही होते हैं छोटे। जैसे ग़ालिब का एक शेर है कि इश्क ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया, वरना आदमी हम भी थे काम के। अब ये ट्विटर पर फिट बैठता है। अगर आपने किसी को टैग कर दिया, हैशटैग कर दिया तो और कुछ कहने की जरूरत नहीं।’

आप शायर हैं या फिर शायरी के मुरीद। ट्विटर और फेसबुक पर आपको तमाम ऐसे ठिकाने मिलेंगे, जहां आपके पसंदीदा शायर और उनका कलाम संजोकर रखा गया है। इसी के साथ आपको अपने जैसे सैकड़ों वो लोग मिलेंगे जो अपने शायरों का इस्तक़बाल करने के लिए बैठे हैं।
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