जापान के आम चुनाव में प्रधानमंत्री शिंजो अबे को मिली भारी जीत के बावजूद उनके लिए देश के युद्ध विरोधी संविधान में संशोधन करना आसान नहीं होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ चुनाव प्रणाली के कारण अबे के गठबंधन को दो तिहाई से ज्यादा बहुमत मिला है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें संविधान में बदलाव करने का जनादेश भी मिल गया है क्योंकि जनता इस मुद्दे पर बुरी तरह बंटी हुई है।
इस चुनाव में मतदान प्रतिशत बहुत कम रहा है, इसलिए यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि अबे को आम जनता का भारी समर्थन हासिल है। अबे की पार्टी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी को त्रूटिपूर्ण चुनाव प्रणाली और बिखरे हुए विपक्ष का फायदा मिला है।
मेलबर्न की आरएमआईटी यूनिवर्सिटी में जापान की विशेषज्ञ डॉ. एम्मा डाल्टन का कहना है कि जापान के लिए संविधान संशोधन सबसे जटिल मुद्दा है। इस मुद्दे पर यहां की जनता ठीक उसी तरह बंटी हुई है जैसे ब्रेक्सिट पर ब्रिटेन और प्रवासियों एवं गर्भपात पर अमेरिका।
संविधान में बदलाव पूरे जापान के लिए और खासकर अबे के लिए काफी भावनात्मक मुद्दा है। इसलिए वे इसके बारे में सबसे बात करना चाहते हैं। संविधान संशोधन के लिए उन्हें जनमत संग्रह का सामना करना पड़ेगा।
यही सबसे बड़ी दिक्कत है। ब्रिटेन में सत्ताधारी पार्टी को ब्रेक्सिट के मुद्दे पर जनमत संग्रह में मुंह की खानी पड़ी है। इसके मद्देनजर यह आशंका है कि अगर अबे भी संविधान संशोधन पर आगे बढ़ते हैं तो उन्हें भी हार का सामना करना पड़ सकता है।