जैसे-जैसे इराक और सीरिया का दोहरा संकट बढ़ रहा है, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की ओर से लिया जाने वाला आसन्न फैसला पश्चिमी देशों के नजरिए में एक नया मोड़ साबित हो सकता है।
अमेरिकी नौसैनिक युद्धपोत दर्जनों लड़ाकू विमानों के साथ जैसे-जैसे उत्तर में खाड़ी की ओर बढ़ रहा है, राष्ट्रपति ओबामा अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद द्वारा सामने रखे गए विकल्पों पर विचार कर रहे हैं।
अमेरिका के सामने एक बड़ी दुविधा है और उसका फैसला पश्चिमी देशों को बहुत ज्यादा प्रभावित कर सकता है।
क्या करेंगे ओबामा?
अगर अमेरिका आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड लैवेंट) की बढ़त रोकने के लिए इराकी सरकार के समर्थन में सैन्य हस्तक्षेप नहीं करता है तो उस पर 'आतंकवाद का मुकाबला करने में कमजोर पड़ने', 'मध्य पूर्व में उम्मीद छोड़ने' और एक ऐसे सहयोगी को छोड़ देने का आरोप लगेगा, जिसकी मदद के लिए वह करदाताओं के खरबों डॉलर लगा चुका है और जहां 4,000 से ज्यादा महिला और पुरुषों ने अपनी जान गंवाई है।
अगर अमेरिका सैन्य हस्तक्षेप करने का फैसला करता है, जो बहुत संभव है कि स्पष्ट रूप से चिह्नित आईएसआईएस ठिकानों पर हवाई हमलों या मिसाइल हमलों के रूप में होगा तो वह मध्य पूर्व के संघर्ष की पूरी तस्वीर को ही बदल देगा।
मोटे तौर पर अमेरिका अपनी उपस्थिति दो तरह से दर्ज करवा सकता है:-
अंतर्राष्ट्रीय चरमपंथ
अगर अमेरिका के हवाई या मिसाइल हमलों में सीधे आईएसआईएस के लड़ाके मारे जाते हैं तो अनिवार्य रूप से अमेरिका और ब्रिटेन समेत उसके सहयोगियों के खिलाफ बदला लेने का आह्वान किया जाएगा।
अभी तक ब्रितानी जेहादियों के आईएसआईएस के साथ इराक में लड़ने की कोई पुष्ट सूचना नहीं है। लेकिन सीरिया में लड़ने के लिए गए क़रीब 400-500 ब्रितानी जिहादियों में से ज्यादातर आईएसआईएस के साथ हैं, जिसकी ताकत सीरिया-इराक सीमा के दोनों ओर फैली हुई है।
यह सिर्फ वक्त की बात रह गई है कि सीरिया और इराक के बीच लगातार धुंधली होती जा रही सीमा में ये चरमपंथी आर-पार हो जाएं।
यदि आईएसआईएस के लड़ाके अमेरिकी हवाई हमलों में 'शहीद' हो जाते हैं तो एक झटके में अमरीका इस वृहद संघर्ष में शामिल हो जाएगा और आईएसआईएस का दुश्मन बन जाएगा। यह कल्पना करना मुश्किल नहीं है कि इससे मध्यपूर्व से लौट रहे जिहादियों के द्वारा पश्चिम में और ज्यादा चरमपंथी हमले बढ़ जाएंगे।
सांप्रदायिक तनाव
इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि ह्वाइट हाउस द्वारा इस तरह कितना सैन्य हस्तक्षेप किया जाता है।
मध्यपूर्व में अधिकांशतः इसे इस तरह नहीं लिया जाएगा कि अमेरिका एक हिंसक विद्रोह के खिलाफ एक वैध सरकार को समर्थन कर रहा है बल्कि वे यही मानेंगे कि अमेरिका सुन्नी ताकतों पर हमला करने के लिए बगदाद की शिया प्रभाव वाली सरकार का साथ दे रहा है, जो ईरान की सहयोगी भी है।
बहरीन से लेबनान तक, मध्यपूर्व में शिया और सुन्नियों के बीच भारी सांप्रदायिक तनाव के चलते अमेरिकी पक्षपात, चाहे इसका कोई आधार हो या न हो, बहुत संवेदनशील और खतरनाक हो सकता है।
आईएसआईएस को रोकने की कोशिश
पिछले हफ़्ते, जब आईएसआईएस लड़ाकों ने दक्षिण में बग़दाद की ओर कूच किया तो अमेरिकी हस्तक्षेप करीब-करीब अनिवार्य सा हो गया।
इस हफ़्ते, आईएसआईएस के शिया-प्रभाव वाले शहरों की ओर बढ़ने के बजाय अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में पकड़ मजबूत करने के संकेतों के चलते अमेरिका पर तत्काल कार्रवाई करने का दबाव कुछ कम हो सकता है।
लेकिन पिछले हफ़्ते जिस रफ़्तार से यह संकट खड़ा हुआ, उसे ध्यान में रखते हुए इराक के समर्थन में हवाई या मिसाइल हमले करने या न करने का फैसला अमेरिका अनंतकाल तक नहीं टाल सकता।