वन टीवी के संवाददाता हामिद हैदरी ने कहा कि फरामार्ज और अहमदी की मौत की सूचना मिलने के बाद वह मौके पर गए थे। वहां से ऑफिस लौटने के कुछ मिनट बाद ही वहां दूसरा बम ब्लास्ट हो गया। उन्होंने कहा कि यहां पत्रकारों की मौत काफी चिंताजनक है। रिपोर्टिंग करने जाते वक्त हमेशा भय बना रहता है। घर से निकलने के बाद हमें पता नहीं होता है कि वापस घर लौटेंगे भी या नहीं।
वहीं, तोलो न्यूज के निदेशक लोतफुल्लाह नजफीजादा ने कहा कि अफगानिस्तान में सुरक्षा की स्थिति खराब है। यहां लोग डर के साये में जी रहे हैं। ऐसी स्थिति सिर्फ ब्लास्ट होने वाली जगहों पर नहीं है। ऑफिस आते-जाते समय और ऑफिस में रहने के दौरान भी जान जाने का खतरा रहता है। उन्होंने कहा कि अक्तूबर में यहां चुनाव होने हैं। लेकिन जिस प्रकार पत्रकारों की एक के बाद एक मौत हो रही है, उसे देखते हुए खुलकर काम करना काफी मुश्किल है।
अफगान एडवोकेसी ग्रुप इंटेग्रिटी वॉच के कार्यकारी निदेशक सैयद इकराम ने कहा कि पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर सरकार और मीडिया हाउस दोनों को सोचना चाहिए। दोनों को एहतियात बरतनी चाहिए। आत्मघाती हमले की रिपोर्टिंग सोच समझ कर करनी चाहिए।
वहीं, बीबीसी के ब्यूरो चीफ शोएब शरिफी का कहना है कि आत्मघाती हमले की रिपोर्टिंग पर पूरी तरह बैन लगाने से मसला हल नहीं होगा। लेकिन सुरक्षा से भी समझौता नहीं किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि रिपोर्टिंग के लिए ऑफिस से बाहर जाने से पहले स्थिति का बेहतर आकलन करना जरूरी है। खतरे को कम करने के लिए हम लोग ऐसा ही करते हैं।
सही जानकारी के लिए बम ब्लास्ट के बाद मौके पर जाना जरूरी
न्यूज एंड करंट अफेयर्स के हेड अब्दुल्ला खेनजानी ने बताया कि आत्मघाती हमले में पत्रकारों की मौत चिंताजनक है, लेकिन ऐसी खबरों की रिपोर्टिंग नहीं करना कोई समाधान नहीं है। उन्होंने कहा कि सुरक्षा के साथ बम ब्लास्ट की रिपोर्टिग करने के लिए मौके पर जाना जरूरी है। तभी असली स्थिति का पता चलेगा। उन्होंने कहा कि लोग यह जानना चाहते हैं कि उनके देश में क्या हो रहा है। इसलिए हमें उन्हें बताना जरूरी है।