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‘तानाशाह’ होकर भी ‘शाहों के शाह’ थे फिदेल कास्त्रो

Sat, 26 Nov 2016 10:48 PM IST
न्यूयॉर्क टाइम्स न्यूज सर्विस/हवाना 
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फाइल फोटोः फिदेल कास्त्रो - फोटो : reuters
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वर्ष 1959 में क्यूबा क्रांति छेड़कर देश में एक तानाशाह फुल्गेंकियो बतिस्ता को उखाड़ फेंकने वाले फिदेल कास्त्रो को भी आधी दुनिया तानाशाह ही मानती है। दूसरी तरफ उस वक्त के कम्युनिस्ट देश सोवियत संघ और अब रूस, चीन व सर्बिया समेत कई देश फिदेल द्वारा अमेरिका को लगातार ललकारने के कारण लोकप्रिय मानते है। क्यूबा में उन्हें देवदूत माना जाता है। 
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फिदेल कास्त्रो पूंजीवाद के कट्टर विरोधी रहे थे। उन्होंने 1956 में एक असफल क्रांति की शुरूआत की थी और उसके बाद 1959 में सफल किंतु हिंसक क्यूबा क्रांति का नेतृत्व किया। शुरूआत में जब उन्होंने अमेरिकी समर्थक बतिस्ता के खिलाफ जंग छेड़ी थी तब क्रांति के विफल रहने पर उन्हें 15 साल की जेल हुई थी।

इसी दौरान उन्होंने अपना प्रसिद्ध भाषण दिया जिसे ‘इतिहास मुझे क्षमा करेगा’ नाम से जाना जाता है। बाद में अमेरिका व क्यूबा के बीच हुए एक समझौते के बाद वह जेल से रिहा हुए और अपने भाषण की अमिट छाप छोड़ चुके फिदेल ने लोगों की मदद से 1959 में क्यूबा के एक तानाशाह का तख्ता पलट कर दिया। इसके बाद कास्त्रो एक राष्ट्रीय हीरो बनकर उभरे और पांच दशक तक सत्ता पर काबिज रहे। 
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करीब 50 वर्षों के कार्यकाल में उन्हें चीन और रूस के अलावा अमेरिका विरोधी देशों में 'शाहों का शाह' माना जाता रहा, जबकि दूसरे ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस आदि देशों में उन्हें एक तानाशाह के बतौर माना जाता था। कास्त्रो ने विपक्षी दलों के नेताओं को या तो जेलों में ठूस दिया था अथवा मृत्युदंड दे दिया था। स्थानीय मीडिया पर अंकुश लगाते हुए अभिव्यक्ति की आजादी भी छीन ली गई।
 

अमेरिका ने 600 बार फिदेल की हत्या का प्रयास

​इसके अलावा सत्ता में आते ही क्यूबा से सारे अमेरिकी निवेश तथा उद्योगों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इससे देश में अमेरिकी कंपनियों से जुड़े कई छोटे उद्योगों के खत्म होने के साथ कई लोग बेरोजगार हो गए। उनकी तानाशाही का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राजधानी हवाना में आज भी कई जगह लिखा हुआ है ‘समाजवाद या मौत’।

दूसरी तरफ, फिदेल ने देश के लिए कई बड़े काम भी किए हैं। उन्होंने जब देश की जनता को शिक्षित करने की ठानी तो ऐसा अभियान चलाया कि एक साल में देश के 95 फीसदी से ज्यादा लोग शिक्षित हो गए। आज भी लेटिन अमेरिका के किसी देश में यहां से अधिक शिक्षा दर कहीं की नहीं है।

क्यूबा में स्वास्थ्य सेवाएं सरकारी हैं और दुनिया में बेहतरीन हैं। स्वास्थ्य सेवाओं का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां की शिशु मृत्यु दर प्रति हजार सिर्फ 7 है, जो अमेरिका से भी बेहतर है। भारत में यह दर 46 है। 

अमेरिका ने 600 बार किया फिदेल की हत्या का प्रयास
फिदेल कास्त्रो ने दावा किया है कि अमेरिकी एजेंसी सीआईए ने 600 से ज्यादा बार उनकी हत्या करने की योजना बनाई थी, लेकिन हर बार नाकामी हाथ लगी। कास्त्रो ने सीआईए द्वारा किए जाने वाले इन हमलों के लिए एक बार यह तक कहा था कि ‘यदि हमलों से बचने का कोई ओलिंपिक ईवेंट होता तो मुझे उसमें गोल्ड मेडल जरूर मिलता।’

प्रसिद्ध अंग्रेजी अखबार ‘गार्डियन’ में छपे एक लेख में कहा गया था कि सीआईए ने क्यूबा के इस तानाशाह को ठिकाने लगाने के लिए जो तरीके अपनाए उससे जेम्स बॉन्ड भी शरमा सकता है। फिदेल को जहर की गोलियां दी गईं, सिगार के शौकीन उनके सिगार में जहर भरा गया और एक बार ऐसा पाउडर भी दिया गया जिससे उनकी दाढ़ी ही उखड़ जाए, ताकि दुनिया फिदेल को पहचान ही नहीं पाए। 
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हजारों महिलाओं के साथ रहे थे संबंध

- फोटो : reuters
हजारों महिलाओं के साथ रहे थे संबंध
वर्ष 2008 में एक रिपोर्ट के अनुसार फिदेल कास्त्रो ने अपने जीवन के 82 वर्षों में हजारों महिलाओं से संबंध बनाए थे। द न्यूयॉर्क पोस्ट ने कास्त्रो के एक अधिकारी के हवाले से बताया था कि उन्हें सिगार की ही तरह यह भी एक शौक था। दि डेली टेलीग्राफ के मुताबिक फिदेल ने अलग अलग औरतों के साथ कम से कम 10 बच्चे पैदा किए थे।

अपने समय में वह बला के आकर्षक इंसान थे जिन पर लड़कियां जान छिड़कती थीं। खुद कास्त्रो इस मामले में बेबाक बयानी के लिए जाने जाते थे। वर्ष 2003 में बनी एक डॉक्युमेंट्री फिल्म कमांडेंट के डायरेक्टर से कहा कि क्यूबा क्रांति से होने वाले फायदों में एक लाभ यह भी है कि आज हमारे देश की वेश्याएं भी ग्रेज्युएट हैं। 

नाजायज संतान थे फिदेल कास्त्रो
कास्त्रो अपने माता-पिता के नाजायज बेटे थे। उनके पिता एक अमीर व्यापारी थे और उनकी मां एक घरेलू सेवक थीं। वह मजदूरों के बीच ही पले पढ़े थे इसलिए अमीर और गरीब के बीच पनपती असमानता को वह प्रत्यक्ष रूप से देख पाए थे। छात्र राजनीति में इसका असर देखा गया जहां उनके बागी तेवर जल्द ही सबकी नजरों में आ गए। सरकार की आलोचना करने वाले उनके भाषण इतने जबरदस्त होते थे कि जल्द ही पूरे देश का ध्यान उनकी तरफ खिंचता चला गया। 

क्रांति के बारे में कास्त्रो की राय
1959 में कास्त्रो ने कहा था कि क्रांति कोई गुलाबों का बिस्तर नहीं होती। यह भूत और भविष्य के बीच का संघर्ष है। मैंने 82 लोगों के साथ क्रांति की शुरूआत की थी। अगर मैं दोबारा ऐसा करता हूं तो मैं 10 या 15 लोगों के साथ पूरे भरोसे से क्रांति करूंगा। अगर आपको खुद में भरोसा और एक योजना है, तो यह बिल्कुल मायने नहीं रखता कि आप कितने छोटे हैं।
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