परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) के दरवाजे फिलहाल भारत के लिए बंद होने और कराची में मशहूर कव्वाल अमजद साबरी की हत्या पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में चर्चा के सबसे प्रमुख विषय हैं।
विज्ञापन
कराची से छपने वाला ‘जंग’ लिखता है कि चीन, तुर्की, ब्राज़ील, इसराइल, ऑस्ट्रिया, न्यूज़ीलैंड और आयरलैंड ने एनएसजी के लिए भारत की सदस्यता का इस आधार पर विरोध किया कि उसने परमाणु फैलाव को रोकने वाले समझौते एनपीटी पर दस्तख्त नहीं किए हैं।
अखबार लिखता है कि ये भारतीय अधिकारियों के लिए बड़ा झटका और सैद्धांतिक आधार पर की जाने वाली पाकिस्तान की कोशिशों की स्पष्ट कामयाबी है। अखबार लिखता है कि चीन और तुर्की जैसे मित्र देशों के अलावा पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान के प्रतिनिधि मंडल ने 55 देशों के सदस्यों से बात की और अपने रुख के बारे में बताया, जिसके सकारात्मक नतीजे सामने आए हैं।
विज्ञापन
लाहौर से छपने वाले ‘नवा-ए-वक्त’ ने लिखा है कि पाकिस्तान और भारत, दोनों को एक ही साथ एनएसजी का सदस्य बनाया जाना चाहिए। अखबार लिखता है कि भेदभावपूर्ण तरीके से अगर भारत को एनएसजी में शामिल किया गया तो इससे दक्षिण एशिया में अस्थिरता बढ़ेगी।
यूरोपीय संघ की सदस्यता के मुद्दे पर ब्रिटेन में हुए जनमत संग्रह पर संपादकीय लिखा है
एनएसजी
- फोटो : BBC
अखबार ने ताशकंद में पाकिस्तानी राष्ट्रपति ममनून हुसैन के साथ मुलाकात में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के इस बयान का भी जिक्र किया है कि चीन हर मंच पर पाकिस्तान का साथ देगा। ‘औसाफ’ ने
यूरोपीय संघ की सदस्यता के मुद्दे पर ब्रिटेन में हुए जनमत संग्रह पर संपादकीय लिखा है- ब्रिटेन यूरोपीय यूनियन की ‘ग़ुलामी’ से आजाद, प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के इस्तीफे का एलान।
अखबार लिखता है कि ब्रिटेन यूरोपीय संघ से निकलने वाला पहला देश होगा, लेकिन उसे संघ में रहने के फायदे और उससे निकलने के नुकसानों का आकलन करना होगा। अखबार के मुताबिक जिस तरह कैमरन ने इस्तीफे का एलान किया है, वो लोकतंत्र की खूबसूरती है, काश पाकिस्तान के राजनेता भी इस सुनहरी परंपरा को आगे बढाएं और जनता की इच्छा का सम्मान करने की कोई मिसाल कायम करें।
‘दुनिया’ लिखता है कि प्रतिबंधित तहरीके तालिबान पाकिस्तान ने कराची में कव्वाल अमजद साबरी की हत्या की जिम्मेदारी कबूल की है और अगर ये दावा दुरुस्त है तो इसका मतलब है कि ये लोग अब भी इतनी ताकत रखते हैं कि किसी को भी अपनी गोली को निशाना बन सकें।
चरमपंथियों के खिलाफ सेना के ऑपरेशन ‘जर्ब-ए-अज़्ब’ के दूसरे चरण
एनएसजी
- फोटो : BBC
अखबार लिखता है कि चरमपंथियों के खिलाफ सेना के ऑपरेशन ‘जर्ब-ए-अज़्ब’ के दूसरे चरण में उन लोगों पर हाथ डालने के काम में तेजी लाने की जरूरत है जो शहरों में इन लोगों की मदद कर रहे हैं। अखबार लिखता है कि अमजद साबरी के कत्ल से दो दिन पहले ही सिंध हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस सज्जाद अली शाह के बेटे औवेस अली शाह को एक व्यस्त इलाके से अगवा कर लिया गया।
‘एक्सप्रेस’ ने कराची में कानून व्यवस्था के खराब हालात का जिक्र करते हुए लिखा है कि बहुत हो गया, अब सत्ता में बैठे लोगों को गफलत की नींद से जगना ही होगा। अखबार की राय है कि सिर्फ पाकिस्तानी अर्धसैनिक बल रेंजर्स की आलोचना करके कुछ हासिल नहीं होगा, बल्कि ‘शहर-ए-क़ायद’ में अमन के लिए सभी पक्षों और कानून लागू करने वाली एजेंसियों को एकजुट होकर काम करना होगा।
अखबार अजमद साबरी के जनाजे में उमड़े जनसैलाब पर लिखता है कि ये कराची के इतिहास में शायद सबसे बड़ा जनाजा था जिसमें देश भर से उनके चाहने वाले और महिलाएं भी बड़ी संख्या में शामिल थीं।
रुख भारत का करें तो 'हिंदोस्तान एक्सप्रेस' का संपादकीय है- इफ़्तार की बदलती सियासत। अखबार कहता है कि बरसों बाद ये पहला मौका है जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने खुद को इफ्तार से दूर करने का फैसला किया है।
2014 के चुनावों में हार के बाद बनी एंटनी कमेटी ने सॉफ्ट हिंदुत्व की तरफ लौटने का मशविरा दिया था
एनएसजी
- फोटो : BBC
अखबार कहता है कि 2014 के चुनावों में हार के बाद बनी एंटनी कमेटी ने सॉफ्ट हिंदुत्व की तरफ लौटने का मशविरा दिया था और कहा था कि ये पैगाम जा रहा है कि कांग्रेस हिंदू हितों को नजरअंदाज कर रही है और इसीलिए कांग्रेस ने इफ्तार से दूर रहने का फैसला किया है।
दूसरी तरफ अखबार लिखता है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इफ्तार की दावत से 'मिशन 2019' का रास्ता देख रहे हैं जबकि आरएसएस भी अपने एक संगठन के जरिए बड़े पैमाने पर इफ्तार देकर मुसलमानों की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा है। 'हमारा समाज' ने एक के बाद एक विवादास्पद बयान देने वाले भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी पर संपादकीय लिखा है।
अखबार कहता है कि पहले गांधी परिवार, फिर आरबीआई रघुराम राजन, अरविंद केजरीवाल, दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर नजीब जंग और अब केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम पर स्वामी की निगाहें बड़े शक को जन्म देती हैं।
अखबार कहता है कि भाजपा स्वामी के खिलाफ कोई कदम क्यों नहीं उठाती है जबकि उन्होंने साफ कहा है कि उनके पास 27 लोगों की सूची है जिनके खिलाफ वो अपनी मुहिम जारी रखेंगे।
अखबार कहता है कि क्या बीजेपी में हर कोई इतना आजाद है कि जिसके मुंह में जो आए बोल जाता है और पार्टी नेतृत्व हक्का बक्का रह जाता है। अखबार के मुताबिक अगर ऐसा नहीं है तो फिर स्वामी के बयानों को पार्टी की मर्जी के मुताबिक ही माना जाएगा।