रविवार को जब भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बैंकॉक में बैठक कर रहे थे, ठीक उसी वक्त बांग्लादेश पाकिस्तान से अपने संबंधों की समीक्षा की बात कर रहा था।
बांग्लादेश के विदेश मंत्री अब्दुल हसन महमूद अली ने पत्रकारों से कहा कि उनका मंत्रालय पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा कर रहा है।
नरम अंदाज में पेश आने वाले अब्दुल हसन महमूद अली पाकिस्तानी विदेश सेवा के अधिकारी थे और वो 1971 में विद्रोह कर बांग्लादेशी सरकार से जुड़े थे।
उन्होंने कहा, "पाकिस्तान के साथ हमारे संबंध काफी तनावपूर्ण हैं, क्योंकि हम उनका दखल नहीं चाहते। वो जिस तरह फांसी पर लटकाए गए हमारे युद्ध अपराधियों का बचाव कर रहे थे, वह हमें पसंद नहीं आया।"
हुई कूटनीतिक तकरार
दरअसल बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में 'मानवता के खिलाफ' अपराध में दोषी पाए गए इस्लामी नेताओं के मुद्दे पर बांग्लादेश और पाकिस्तान में कूटनीतिक तकरार हुई।
तकरार तब शुरू हुई जब पाकिस्तान के पांच जाने-माने लोगों (ये लोग 1971 में शीर्ष पदों पर तैनात थे) ने युद्ध अपराधी सलाहुद्दीन कादिर चौधरी का बचाव किया था।
कादिर को 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान 'मानवता के खिलाफ' अपराध के दोष में इस साल 22 नवंबर को फांसी दे दी गई थी।
बांग्लादेश की सुप्रीम कोर्ट ने बचाव की उनकी अपील को खारिज कर दिया था।
पाकिस्तान सलाहुद्दीन कादिर चौधरी और जमात-ए-इस्लामी के नेता अली हसन मुजाहिद को बचाने की लगातार कोशिश कर रहा थ। जब इन दोनों नेताओं को फांसी दी गई तो, पाकिस्तान सरकार ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी।
पाक ने फांसी को व्यथित करने वाला बताया
इस्लामाबाद में जारी सरकारी बयान में फांसी को व्यथित करने वाला बताते हुए मुकदमों में कई खामियां गिनाई गई थीं।
इस पर बांग्लादेशी विदेश मंत्रालय ने ढाका स्थित पाकिस्तानी राजनयिक को बुलाकर विरोध दर्ज कराया था।
इस विरोध पत्र में कहा गया है कि पाकिस्तान न केवल बांग्लादेश के आंतरिक मामलों में दखल दे रहा है, बल्कि इससे यह भी जाहिर होता है कि वह 1971 की ज्यादतियों में अपनी भूमिका को अप्रत्यक्ष तौर पर स्वीकार कर रहा है।
इसके बाद पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने बांग्लादेश के कार्यकारी उच्चायुक्त को तलब कर कहा, "पाकिस्तान सरकार बांग्लादेशी सरकार के बेबुनियाद दावे को खारिज करती है।"
पाकिस्तानी संसद के पूर्व स्पीकर फजलुल कादिर चौधरी के बेटे सलाहुद्दीन कादिर चौधरी को कई अमानवीय घटनाओं का जिम्मेदार माना जाता था, जिसमें आयुर्वेदिक दवाओं की एक दुकान की श्रृखंला चलाने वाले हिंदू की हत्या शामिल थी।
कई लोगों का अपहरण कर की थी हत्या
चटगांव से छह बार सांसद रहे सलाहुद्दीन एचएम इरशाद के सैन्य शासन में मंत्री रहे और बाद में बांग्लादेशी नेशनलिस्ट पार्टी से जुड़ गए। वो पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के संसदीय सलाहकार भी रहे।
अली हसन मुजाहिद ने कुख्यात सैन्य बल अल-बदर का 1971 में नेतृत्व किया था। इसने युद्ध के दौरान कई बुद्धिजीवियों का अपहरण कर उनकी हत्या कर दी थी। वे 2001-06 के दौरान बांग्लादेशी नेशनलिस्ट पार्टी और जमात गठबंधन की सरकार में मंत्री थे।
बांग्लादेश में मौजूदा शेख हसीना सरकार सबसे ज्यादा नाराज इस बात से हुई कि चौधरी ने कोर्ट में लाहौर की पंजाब यूनिवर्सिटी का एक सर्टिफिकेट पेश किया।
इसके मुताबिक मुक्ति संग्राम के दौरान उन्होंने अपना अधिकांश समय पश्चिम पाकिस्तान में बिताया था।
हालांकि उस सर्टिफिकेट से चौधरी को कोई मदद नहीं मिली। लेकिन ढाका में कई लोग खफा जरूर हो गए। यहां तक कि पाकिस्तान की नामी मानवाधिकार कार्यकर्ता आस्मां जहांगीर ने कहा कि चौधरी और मुजाहिद की फांसी पर जिस तरह पाकिस्तान ने प्रतिक्रिया जाहिर की है, उससे ऐसा लगता है कि वे पाकिस्तान के ही एजेंट थे।
पाक ने लिया अपराधियों का पक्ष
बांग्लादेश सरकार ने पाकिस्तान के युद्ध अपराधियों का खुले तौर पर पक्ष लेने पर विरोध जताया।
इस नोट के बाद बांग्लादेशी उच्चायुक्त को एक बार फिर पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने तलब किया। इस बार पाकिस्तान सरकार ने युद्ध के दौरान हुए अपराधों और अत्याचारों में मिलीभगत के आरोपों को खारिज किया।
हालांकि ये नोट भड़काऊ ज्यादा था। इसमें कहा गया था,"बांग्लादेश लगातार पाकिस्तान को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है, जबकि हम उससे भाईचारे जैसा संबंध रखने की कोशिश कर रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है।"
नोट के मुताबिक, "पाकिस्तान के लोगों का दिल बांग्लादेश के लोगों के साथ धड़कता है। दोनों देशों को यह याद रखना चाहिए कि इन लोगों के संघर्ष से ही दक्षिण एशियाई द्वीप में मुसलमानों के लिए अलग देश बना था।"
इस पर ढाका में काफी उग्र प्रतिक्रिया देखने को मिली।
बांग्लादेश के पूर्व सैन्य प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल केएम शफीउल्ला ने प्रधानमंत्री शेख हसीना से पाकिस्तान के साथ तत्काल सभी संबंधों को तोड़ने का अनुरोध किया।
आईएसआई कर रहा हत्यारों की मदद
साल 2013 के शाहबाग विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले जनजागरण मंच ने सभी 'युद्ध अपराधियों' की फांसी की मांग की और कहा कि पाकिस्तान के साथ रिश्ते रखने की कोई वजह नहीं है।
मंच के प्रवक्ता इमरान एच ने कहा, "हमारे लेखकों और ब्लॉगरों की हत्या करने वाले कट्टरपंथियों की मदद आईएसआई कर रहा है, ऐसे में हम उनसे रिश्ता क्यों रखे हुए हैं?"
एक अन्य समूह दलाल निर्मूल समिति के संयोजक शहरयार कबीर ने कहा, "हमें पाकिस्तान को चेतावनी देनी चाहिए कि वो अपने काम से मतलब से रखे और इतिहास को स्वीकार करे।"
शेख हसीना सरकार ऐसे सबूत मिलने से भी नाराज है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई बांग्लादेश के चरमपंथी समूहों की मदद कर रही है।
इस साल फरवरी में बांग्लादेश ने पाकिस्तान को एक अधिकारी मोहम्मद मजहर खान को बांग्लादेश से हटाने के लिए बाध्य किया था।
'बातें बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की है आदत'
ढाका के पाकिस्तान उच्चायोग में तैनात खान पर चरमपंथियों को आर्थिक मदद देने और जाली नोट चलाने का आरोप था।
हसीना 2000 में जब पहली बार सत्ता में आई थीं, तब बांग्लादेश ने पाकिस्तान के एक राजनयिक को तुरंत ढाका छोड़कर जाने को कहा था।
तब पाकिस्तान के उप उच्चायुक्त इरफानुर रहमान राजा को पाकिस्तान सरकार को वापस बुलाना पड़ा था।
राजा ने मुक्ति संग्राम के हताहतों के बारे में कहा था कि बंगालियों को बातें बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की आदत होती है। तब, पहली बार बांग्लादेश ने किसी विदेशी राजनयिक को अवांछित बताया था।