दुनियाभर में कोरोना महामारी की रोकथाम के लिए टीकाकरण ने रफ्तार तो पकड़ ली है लेकिन अब इन टीकों से बनने वाली एंटीबॉडी के ठहराव को लेकर सवाल उठने लगे हैं। इन दिनों लोग वैज्ञानिकों से पूछ रहे हैं कि वह दोनों टीके लगवाकर क्या हमेशा के लिए संक्रमण से निश्चिंत रह सकते हैं या उन्हें फिर बूस्टर डोज की जरूरत पड़ेगी। लेकिन लोगों को फिलहाल इसका कोई जवाब नहीं मिल पा रहा है।
क्या कुछ कोरोना वैक्सीनों से अन्य के मुकाबले ज्यादा लंबी प्रतिरक्षा मिल सकती है?
वैज्ञानिकों ने पहले पाया है कि विभिन्न तकनीकों से बने टीकों का प्रभाव अलग-अलग हो सकता है। अभी एमआरएनए तकनीक से बनी फाइजर और मॉडर्ना की वैक्सीनें सबसे प्रभावी मानी जा रही हैं। वहीं, सिनोफार्मा और भारत बायोटेक के निष्क्त्रिस्य (इनएक्टिवेटेड) वायरस से बने टीके थोड़े कम प्रभावी मिले हैं।
यह कब पता लगेगा कि टीके शरीर में अपना प्रभाव खोने लगे हैं?
वैज्ञानिक इसके लिए जैविक पैमाने ढूंढ रहे हैं। यह संभव है कि टीकों का प्रभाव मापने को लेकर एंटीबॉडी का एक निश्चित स्तर निर्धारित किया जाए। जब किसी के रक्त में इस स्तर से ज्यादा एंटीबॉडी मिले तो इसका मतलब होगा कि आप सुरक्षित हैं। स्तर से कम एंटीबॉडी होने पर संक्रमण का जोखिम माना जाए।
टीकों के बाद कोरोना के नए स्वरूपों से कितने सुरक्षित?
हो सकता है कि नए-नए स्वरूपों को रोकने के लिए हमें बूस्टर डोज की जरूरत पड़े। लेकिन, इसे लेकर स्थिति ज्यादा साफ नहीं है। कुछ म्यूटेशन टीकों को बेअसर कर सकते हैं। पिछले माह कतर में फाइजर वैक्सीन को लेकर एक शोध प्रकाशित हुआ था।
इसमें उन 2.50 लाख लोगों को शामिल किया गया, जिन्हें दिसंबर 2020 से इस साल मार्च तक फाइजर के टीके लगाए गए थे। नतीजों में यह वैक्सीन कोरोना के मूल स्वरूप पर 95 फीसदी प्रभावी पाई गई। पर इसके अल्फा स्वरूप पर इसका प्रभाव घटकर 89.5 फीसदी हो गया।
..तो क्या कोरोना के स्वरूप विशेष के लिए खास टीके की जरूरत पड़ेगी?
इस पर अभी ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि वायरस के मूल स्वरूप के खिलाफ बनी उच्च प्रतिरक्षा दूसरे स्वरूपों से भी पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करेगी। लेकिन यह संभव है कि किसी स्वरूप विशेष के लिए बना टीका ज्यादा प्रभावी रहे। इस दिशा में फाइजर ने ट्रायल भी शुरू कर दिए हैं।