वैज्ञानिकों ने कहा कि हालांकि, यह अध्ययन पूरी तरह से कारण-प्रभाव साबित नहीं करता, लेकिन इसे एक बड़ी उम्मीद माना जा रहा है। साल 2050 तक दुनिया भर में डिमेंशिया के मरीजों की संख्या 15 करोड़ पार होने का अनुमान है, ऐसे में पढ़ना-लिखना एक सरल और प्रभावी बचाव का रास्ता हो सकता है।
पढ़ने लिखने की आदत से भूलने की बीमारी का खतरा 40 फीसदी तक कम रहता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, अकसर बुढ़ापे में याद्दाश्त खोने और मानसिक कमजोरी (डिमेंशिया) के बढ़ते खतरे देखे गए हैं। लेकिन हालिया शोध से पता चलता है कि जीवनभर पढ़ने, लिखने और नई भाषाएं सीखने जैसी बौद्धिक गतिविधियों में सक्रिय रहने वाले लोगों में डिमेंशिया का खतरा कम हो सकता है। यह शोध बताता है कि हम अपने दिमाग को जितना व्यस्त रखेंगे, अल्जाइमर जैसी बीमारियों को उतना ही पीछे धकेल पाएंगे।
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शिकागो की रश यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर की शोधकर्ता एंड्रिया जमिट के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन में पाया गया कि मानसिक स्वास्थ्य केवल बुढ़ापे की आदतों पर निर्भर नहीं करता, बल्कि यह जीवनभर के बौद्धिक परिवेश से प्रभावित होता है। शोधकर्ताओं ने लगभग 1,939 बुजुर्गों पर आठ साल तक नजर रखी। इनकी औसत आयु 80 वर्ष के करीब थी।
मानसिक गिरावट में देरी
सक्रिय लोगों में मानसिक कमजोरी आने की उम्र में करीब सात साल का अंतर देखा गया। डॉ. जमिट ने कहा कि सीखने की ललक पैदा करने वाले कार्यक्रम जैसे लाइब्रेरी तक पहुंच और शुरुआती शिक्षा कार्यक्रम, डिमेंशिया के मामलों को कम करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। शोध में यह भी पाया गया कि जिन लोगों की मृत्यु हुई, उनके शव परीक्षण में भी उच्च बौद्धिक स्तर वाले लोगों की सोचने-समझने की क्षमता मरने से पहले तक बेहतर पाई गई।
सक्रियता दूर करती है बीमारी
निष्कर्षों में सामने आया कि जो लोग बचपन से लेकर बुढ़ापे तक किताबों, अखबारों, लाइब्रेरी और भाषा सीखने जैसे कामों से जुड़े रहे, उनमें अल्जाइमर का खतरा उन लोगों की तुलना में 38 फीसदी कम था, जो इन गतिविधियों में कम सक्रिय थे। मानसिक रूप से सक्रिय लोग औसतन 94 वर्ष की आयु में अल्जाइमर का शिकार हुए, जबकि सक्रिय न रहने वालों में यह लक्षण 88 वर्ष में ही दिखने लगे।
भविष्य को लेकर बढ़ी उम्मीदें
वैज्ञानिकों ने कहा कि हालांकि, यह अध्ययन पूरी तरह से कारण-प्रभाव साबित नहीं करता, लेकिन इसे एक बड़ी उम्मीद माना जा रहा है। साल 2050 तक दुनिया भर में डिमेंशिया के मरीजों की संख्या 15 करोड़ पार होने का अनुमान है, ऐसे में पढ़ना-लिखना एक सरल और प्रभावी बचाव का रास्ता हो सकता है।