जानकारों का कहना है कि बीबीसी ब्रिटिश सरकार के हाथ में पूरी दुनिया में अपनी राय प्रचारित करने का एक मजबूत माध्यम है। विदेश मंत्री राब ने बीबीसी के लिए अतिरिक्त बजट का एलान करते हुए उसे 'पूर्वाग्रह से मुक्त और निष्पक्ष' संस्था बताया।
लेकिन इस साल इंटीग्रेटेड रिव्यू नामक ब्रिटिश सरकार के दस्तावेज में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस को ब्रिटिश ‘सॉफ्ट पॉवर’ का एक उपकरण बताया गया था। इस दस्तावेज में ब्रिटिश विदेश और रक्षा मंत्रालयों की प्राथमिकताओं का जिक्र था। उसमें रूस और चीन जैसे ‘प्रतिस्पर्धियों’ के खिलाफ जिन उपकरणों के इस्तेमाल की बात कही गई, उनमें बीबीसी का नाम भी था। उसी दस्तावेज को आधार बना कर डॉमिनिक राब ने बीबीसी वर्ल्ड सर्विस को 80 लाख पाउंड की अतिरिक्त रकम मुहैया कराने का एलान किया है।
उन्होंने कहा कि ये रकम हानिकारक दुष्प्रचार का मुकाबला करने, दुनिया भर में 'गलत रिपोर्टिंग' को चुनौती देने और डिजिटल प्रसारण में सुधार करने के लिए उपलब्ध कराई जा रही है। उन्होंने बताया कि बीसीसी को एफसीडीओ से 2016 के बाद से 37 करोड़ 80 पाउंड की रकम दी गई है। अब दी गई रकम उसके अतिरिक्त होगी।
रूसी टीवी चैनल रशिया टुडे की वेबसाइट पर छपी एक टिप्पणी में कहा गया है कि बीबीसी को 'फेक न्यूज' का मुकाबला करने जैसे अस्पष्ट मिशन पर लगाया गया है। इसका मतलब यह होगा कि ये प्रसारण संस्था ब्रिटिश सरकार के भू-राजनीतिक फायदों के मुताबिक सूचना अभियान चलाएगी।
इस टिप्पणी में कहा गया है कि ऐसा करने का बीबीसी का पुराना इतिहास रहा है। पिछले मार्च में जारी दस्तावेजों से जाहिर हुआ था कि बीबीसी की चैरिटी एजेंसी- बीबीसी मीडिया एक्शन ने खुल कर रूसी पत्रकारों से संबंध बढ़ाए। उसका इस्तेमाल करते हुए उसने रूसी भाषी इलाकों में ब्रिटिश सरकार समर्थक और रूस विरोधी प्रचार अभियान चलाया। ऐसा एफसीडीओ के इशारे पर किया गया।
इसके पहले 2018 में एफसीडीओ की दुष्प्रचार विरोधी और मीडिया डेवलपमेंट शाखा के प्रमुख एंडी प्राइस ने ब्रिटिश सरकार का मिशन साफ शब्दों में बताया था। उन्होंने कहा कि मकसद पत्रकारों और मीडिया संगठनों को साथ लेकर रूस सरकार के प्रभाव को कमजोर करना है।
ब्रिटिश सरकार के नजरिए को सच बताया जाएगा
रशिया टुडे ने कहा है कि बीसीसी और एफसीडीओ के इस पुराने इतिहास को देखते हुए अनुमान है कि नए मिले धन का उपयोग बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ब्रिटिश सरकार के नजरिए से जो सच है, उसे फैलाने की कोशिश करेगी। इस टिप्पणी में आरोप लगाया गया है कि इस काम में सिर्फ बीबीसी ही नहीं, बल्कि समाचार एजेंसी थॉमसन रॉयर्टस फाउंडेशन भी शामिल है।