सूदन गुरंग जिस सामाजिक संगठन हामी (हामरो अधिकार मंच इनीशिएटिव) से जुड़े रहे हैं, उस पर विपक्ष और मीडिया ने आरोप लगाया है कि इसे विदेशी दूतावासों खासकर अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से फंडिंग मिली है। यूएसएआईडी,एनईडी और कुछ यूरोपीय एनजीओ ने ‘हामी’ को परोक्ष सहायता दी है। आलोचकों का दावा है कि इस तरह की संस्थाएं लोकतांत्रिक सुधार और सिविल सोसाइटी को मजबूत करने के नाम पर पश्चिमी प्रभाव फैलाने का काम करती हैं। हालांकि सार्वजनिक ऑडिट में अमेरिकी सरकारी एजेंसियों से सीधे फंडिंग के ठोस प्रमाण अब तक सामने नहीं आए हैं। काठमांडो स्थित अमेरिकी दूतावास ने सफाई देते हुए कहा है कि नेपाल में दी जाने वाली कोई भी सहायता पूरी तरह पारदर्शी और कानूनी है। यह केवल शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तीकरण और प्रशासनिक क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों तक सीमित है। बावजूद इसके विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल की संवेदनशील राजनीति में ऐसे आरोप आसानी से राजनीतिक हथियार बन जाते हैं।
रूस का दृष्टिकोण रंग क्रांति की परछाई
रूसी मीडिया संस्थान आरटी और स्पुतनिक ने नेपाल के छात्र-युवा आंदोलन की तुलना यूक्रेन (2004, 2014) और जॉर्जिया (2003) जैसे रंग क्रांति अभियानों से की है। इन आंदोलनों में जनता की असंतोषपूर्ण भावनाओं का इस्तेमाल कर पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका ने राजनीतिक सत्ता परिवर्तन की जमीन तैयार की थी। रूस का आरोप है कि नेपाल की मौजूदा अस्थिरता का पैटर्न भी वैसा ही है,जहां भ्रष्टाचार और बेरोजगारी जैसे असली मुद्दों के बीच विदेशी ताकतें अपने हित साधना चाहती हैं। रूस यह भी कह रहा है कि अमेरिका नेपाल में युवा शक्ति को एक सॉफ्ट टूल की तरह इस्तेमाल कर सकता है, ताकि भारत व चीन दोनों पर दबाव बनाया जा सके।
नेपाल में सरकार विरोधी प्रदर्शन
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