लेबनान, फ्रांस और जॉर्डन के राष्ट्राध्यक्ष गुरुवार को पेरिस में मिलेंगे। इस बैठक का मकसद मुश्किलों से जूझ रही लेबनानी सेना के लिए समर्थन जुटाना है। दरअसल, लेबनान की आर्थिक तंगी से जूझ रही सेना के लिए एक डोनर कॉन्फ्रेंस शुरू में फरवरी में होनी थी। इसकी अगुवाई फ्रांस, सऊदी अरब और अमेरिका करने वाले थे। हालांकि, ईरान युद्ध और इस्राइल-हिजबुल्ला युद्ध के नए दौर के कारण इसे टाल दिया गया था।
समझौते में क्या था?
लेबनानी सेना अब इस्राइली सेना (जो दक्षिणी लेबनान के बड़े हिस्से पर कब्जा किए हुए है) और हिजबुल्ला के बीच फंसी हुई है। इस चरमपंथी समूह ने हथियार छोड़ने की मांगों को मानने से इनकार कर दिया है। जून में, लेबनान और इस्राइल की सरकारों ने एक फ्रेमवर्क समझौते की घोषणा की थी। जिसके तहत इस्राइल धीरे-धीरे दक्षिणी लेबनान से पीछे हटेगा और लेबनानी सेना नियंत्रण संभालेगी, जबकि हिज्बुल्लाय के हथियार जब्त कर लिए जाएंगे। इस समझौते पर अमल अभी रुका हुआ है।
बैठक में किन मुद्दों पर चर्चा?
लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ आउन के कार्यालय ने एक बयान में कहा कि पेरिस में गुरुवार की बैठक डोनर कॉन्फ्रेंस के लिए आधार तैयार करने पर केंद्रित होगी। इसमें दक्षिणी लेबनान की स्थिति और साल के अंत में संयुक्त राष्ट्र शांति सेना का कार्यकाल खत्म होने के बाद वहां अंतरराष्ट्रीय मौजूदगी की योजनाओं पर भी ध्यान दिया जाएगा।
लेबनान में बदले राजनीतिक हालात
नवंबर 2024 में खत्म हुए पिछले युद्ध में हिजबुल्ला बुरी तरह कमजोर हो गया था।वउसके बाद लेबनान ने आउन और प्रधानमंत्री नवाफ सलाम को चुना। दोनों ने देश में हिजबुल्ला और अन्य गैर-सरकारी सशस्त्र समूहों के हथियार जब्त करने का वादा किया था। इस्राइल और अमेरिका ने इस बात के लिए लेबनान की आलोचना की है कि उसने हिजबुल्ला को हथियार छोड़ने पर मजबूर करने के लिए कोई सीधी सैन्य कार्रवाई नहीं की।
गृहयुद्ध का सता रहा डर?
लेबनानी अधिकारी सेना और हिजबुल्ला के बीच टकराव को लेकर सतर्क हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि इससे गृहयुद्ध छिड़ सकता है। सरकार ने इस बात पर भी जोर दिया है कि उसे पूरे लेबनान में तैनाती के लिए और बेहतर हथियारों से लैस सेना की जरूरत है। इससे वह हिजबुल्ला के उन समर्थकों का भरोसा जीत सकेगी, जो सेना की सुरक्षा क्षमता पर सवाल उठाते हैं।
फंड और हथियारों की कमी
भूमध्य सागर के किनारे बसे इस छोटे से देश की सेना के पास फंड और हथियारों की कमी है। वर्षों से यह सेना अंतरराष्ट्रीय दानदाताओं, खासकर अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और इटली पर काफी हद तक निर्भर रही है।
सऊदी अरब ने क्यों रोकी थी मदद?
सऊदी अरब ने शुरू में 2013 में फ्रांसीसी हथियारों के साथ लेबनानी सेना की मदद के लिए 3 अरब अमेरिकी डॉलर तय किए थे। लेकिन 2016 में सऊदी अरब ने यह मदद रोकने का फैसला किया, क्योंकि राजनीतिक रूप से हिजबुल्ला की ताकत बढ़ गई थी। लेबनान सरकार के सऊदी अरब के साथ संबंध खराब हो गए थे।
आर्थिक संकट से सेना पर असर
2019 के आखिर में देश में आए आर्थिक संकट के बाद से कई सैनिकों ने सेना छोड़ दी या दूसरी नौकरियां करने लगे। इस संकट ने उन सरकारी संस्थानों को प्रभावित किया जो कभी अच्छी सैलरी और सुविधाएं देते थे। लाखों लोगों की बचत बैंकों में फंसी रह गई। महंगाई बढ़ने और सरकारी बजट कम होने की वजह से सेना के लिए सैनिकों को ठीक से सैलरी देना मुश्किल हो गया है।