सरहदें अच्छी भी होती हैं और ख़राब भी। अच्छी इसलिए की सरहदें किसी मुल्क को उसके वजूद का एहसास दिलाती हैं। खराब इसलिए कि ये लोगों को एक दूसरे से जुदा कर देती हैं। सरहदें बनने का दर्द भारत से बेहतर और कौन जान सकता है। सरहद ने एक ही मुल्क के लोगों को एक दूसरे के लिए बेगाना बना दिया। जहां बंटवारे की लाइन खींची गई, वहां के आधे लोग एक तरफ़ और आधे लोग दूसरी तरफ़ के हो गई। सब हिंदुस्तानी से भारतीय और पाकिस्तानी हो गए।
बंटवारे की इस लड़ाई में सरहद के पास ऐसे बहुत से इलाक़े थे जिन पर दोनों मुल्क अपना अपना दावा ठोंक रहे थे। ऐसे ही इलाक़ों में से एक था जम्मू-कश्मीर के बाल्टिस्तान इलाक़े का तुरतुक गांव। बंटवारे के वक़्त ये पाकिस्तान में था। चूंकि ये गांव दोनों मुल्कों की सरहदों के बीच स्थित था, लिहाज़ा यहां बाहरी लोगों के आने पर पाबंदी थी। यहां के लोग बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटे हुए थे। 1971 की लड़ाई में जब पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी, तो तुरतुक भी उसके हाथ से निकल कर भारत में शामिल हो गया।
भारत और पाकिस्तान में खींचतान
जम्मू-कश्मीर की नई सरहदें बनने से पहले बाल्टिस्तान एक अलग राज्य होता था। सोलहवीं सदी तक यहां तुर्किस्तान के यागबू वंश के शासकों ने राज किया था। ये शासक मध्य एशिया से आए थे और 800 से लेकर 1800 ईस्वी तक इन्हों ने यहां राज किया। बाल्टिस्तान के यागबू राजों के राज में कला और साहित्य को ख़ूब बढ़ावा मिला। इनकी कुछ इमारतें तुरतुक गांव में भी हैं। जिन्हें आज म्यूज़ियम की शक्ल दे दी गई है। तुरतुक राजाओं के वंशज आज भी तुरतुक को अपना घर मानते हैं।
भारत और पाकिस्तान के बीच खींचतान का शिकार रहा तुरतुक बरसों तक बेरुख़ी का शिकार रहा। किसी ने यहां की क़ुदरती ख़ूबसरती, यहां की सांस्कृतिक विरासत और सबसे अहम यहां के लोगों के बारे में सोचा ही नहीं। ये इलाक़ा कराकोरम पहाड़ों से घिरा हुआ है. दूर-दूर तक जहां देखिए पहाड़ ही पहाड़ नजर आते हैं।
एक दौर में ये इलाक़ा मशहूर सिल्क रोड से जुड़ा हुआ था। यहां से भारत, चीन, रोम और फ़ारस तक व्यापार होता था। तुरतुक गांव बौद्धों के गढ़ लद्दाख में है, लेकिन यहां कि ज़्यादातर आबादी मुसलमानों की है। इन लोगों पर तिब्बत और बौद्धों का गहरा प्रभाव है. माना जाता है कि ये सभी इंडो-आर्यनों के वंशज हैं। मूल रूप से ये लोग बाल्टी भाषा बोलते हैं, लेकिन इनका खान पान और संस्कृति साझा है।