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ओबामा के भारत दौरे से चिढ़ा पाक मीडिया, क्या है वजह?

Sun, 01 Feb 2015 09:56 AM IST
अशोक कुमार/बीबीसी संवाददाता
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अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का भारत दौरा पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में अभी तक छाया है। दैनिक एक्सप्रेस लिखता है कि अमरीकी राष्ट्रपति के भारत दौरे से साफ हो गया है कि अमरीका आने वाले समय में इस क्षेत्र में किस तरह की नीतियां लागू करना चाहता है।
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अखबार लिखता है कि भारत की तरफ अमरीका का झुकाव इतना बढ़ गया है कि वो उसे सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने का समर्थन तक कर रहा है।

अख़बार के मुताबिक अमरीका अच्छी तरह जानता है कि पाकिस्तान कभी चीन के खिलाफ अमरीका का साथ नहीं देगा, इसलिए उसने भारत को चीन का रास्ता रोकने का जरिया बनाया है।

नवाए वक्त लिखता है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ जब अमरीका गए तो राष्ट्रपति ओबामा ने उन्हें चंद मिनट की मुलाकात का भी वक्त नहीं दिया और भारत आए तो अपने अहम सहयोगी पाकिस्तानी की तरफ कमर करके वापस लौट गए।
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अखबार लिखता है कि इससे भारत की कामयाब और 'हमारी कमजोर विदेश नीति का पता चलता है'।

मोदी की चाय की पाक‌िस्तान में चर्चा

औसाफ लिखता है कि भारतीय प्रधानमंत्री के हाथों की बनी चाय पीने के बाद राष्ट्रपति ओबामा ने जिस तरह दिलदारियां दिखाई हैं, उससे पता चलता है कि वॉशिंगटन की प्राथमिकताएं बदल गई हैं, ठीक वैसे ही जैसे अतीत में बदलती रही हैं।

अख़बार ने कश्मीर का मुद्दा उठाते हुए सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्य की दावेदारी पर भी सवाल उठाया है और भारत और अमरीका के बीच नए रक्षा समझौतों को पूरे क्षेत्र के एक नया खतरा भी बताया है।

दैनिक वक्त ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख के चीन दौरे के हवाले से लिखा है कि पाकिस्तान-चीन दोस्ती हर तरह के संदेहों से ऊपर है, अब बात चाहे 1965 में पाक-भारत युद्ध में पाकिस्तान की मदद करने की हो या फिर सैन्य साजो-सामान की आपूर्ति या फिर परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग।

अखबार लिखता है कि इस दोस्ती को गहराई को देखते हुए कहा जा सकता है कि पाकिस्तान इस क्षेत्र में अकेला नहीं है।

वहीं दैनिक दुनिया ने पाकिस्तान में लगातार जारी पेट्रोल संकट पर लिखा है कि सत्ता संभालते हुए नवाज शरीफ ने कहा था कि मंत्रालयों पर नजर रखी जाएगी और अच्छा काम न करना वाले मंत्रियों को हटा दिया जाएगा, अब पेट्रोल संकट और इस मंत्रालय का कामकाज उन्हें अपना वादा याद दिला रहे हैं।
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भारत में 'सियासी कीचड़'

रुख भारत का करें तो गणतंत्र दिवस पर एक सरकारी विज्ञापन को लेकर हुए विवाद पर राष्ट्रीय सहारा का संपादकीय है- सेक्युलरिज्म और सोशलिज्म पर ऐतराज क्यों?

अखबार कहता है कि 'सबका साथ सबका विकास' के नारे के साथ सत्ता में आई मोदी सरकार पहले रोज से ही विवादित मुद्दों को उठाने की कोशिश कर रही है। अखबार के मुताबिक पहले 370 को खत्म करने की बात, फिर धर्मांतरण को उठाना और इसी तरह राम मंदिर का निर्माण का मुद्दा उठाना।

अखबार के मुताबिक ऐसे विवादित मुद्दों को उठाना किसी दरपरदा एजेंडे को लागू करने का माहौल बनाने की कोशिश का हिस्सा है, संविधान की प्रस्तावना से सेक्युलरिज्म और सोशलिस्ट शब्दों को हटाने भी इसी रणनीति का हिस्सा लगता है।

हमारा समाज ने दिल्ली में समाजसेवी अन्ना हजारे के दो पूर्व सहयोगियों किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल की सियासी जंग पर संपादकीय लिखा है।

अखबार लिखता है कि अन्ना हजारे जहां राजनीति को कीचड़ और गंदगी बताते हैं, वहीं उनके शागिर्द खामोशी से इस कीचड़ में शामिल हो जाते हैं। वहीं कांग्रेस को अखबार की सलाह है कि वो आसमान से नीचे उतरे और भ्रष्टाचार के ख‌िलाफ मुहिम छेड़े।
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