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पाकिस्तान का न रवैया बदला न ही इरादा !

Fri, 19 Dec 2014 03:55 PM IST
अजय साहनी, रक्षा मामलों के जानकार
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पाकिस्तान की अदालत ने 26/11 के मुंबई हमलों के अभियुक्त ज़कीउर रहमान लखवी को ज़मानत दे दी है। भारत में इस पर कड़ी प्रतिक्रिया हुई है। लेकिन पेशावर हमले के बाद पाकिस्तान सरकार ने जिस तरह सभी किस्म के आतंकवाद के ख़िलाफ़ अभियान चलाने का ऐलान किया था उसे देखते हुए यह थोड़ा अप्रत्याशित है।
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हालांकि पाकिस्तान के रवैये में बदलाव के कोई संकेत नज़र नहीं आ रहे थे। पेशावर के शर्मनाक हमले के बाद पाकिस्तान के रवैये में बदलाव, यू-टर्न आ जाने का विचार एक ग़लतफ़हमी थी। लखवी को रिहा करने के अदालती फ़ैसले से पाकिस्तान की नीयत साफ़ हो जाती है। पेशावर हमले के 24 घंटे के अंदर ही जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ और हाफ़िज़ सईद दोनों ने आरोप लगाया था कि भारत और अफ़गानिस्तान ने यह हमला करवाया है।

इससे ज़ाहिर होता है कि पाकिस्तान की पुरानी नीति जारी है जिसके तहत भारत और अफ़गानिस्तान के ख़िलाफ़ नफ़रत पैदा करके, हिंसा करके और दहशतगर्दों की घुसपैठ करवाकर रणनीतिक फ़ायदा लेने की कोशिश की जाए। ये अलग बात है कि पाकिस्तान इन सभी आरोपों का बार-बार खंडन करता आया है।
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ग़ौरतलब है कि इस नीति पर कायम रहना उस समय स्पष्ट हुआ है जब पाकिस्तान देश से चरमपंथ के सफ़ाए की बात कर रहा था।

क्या पाकिस्तान का ये मानना है कि देश के अंदर तो चरमपंथ पर काबू पाया जाए और तहरीक-ए-तालिबान को रोका जाए, लेकिन अफ़गान तालिबान, हक्कानी नेटवर्क, भारत में सक्रिय हिज्बुल मुजाहिदीन, हरकत-उल-मुजाहिदीन, इंडियन मुजाहिदीन- इन्हें समर्थन जारी रहे?

तो क्या स्वतंत्र है पाक न्यायपालिका?

हर देश की प्रणाली अलग है। भारत, ब्रिटेन और अमरीका की अदालतें अलग तरह के काम करती हैं। अधिनायकवादी देशों की अदालतें बिल्कुल भी स्वतंत्र नहीं होतीं। अदालत दरअसल प्रभुत्व का एक ज़रिया मात्र होता है। पाकिस्तान में अदालतों पर सरकार का उतना प्रभाव नहीं होगा जितना उसकी गुप्तचर सेवाओं और सेना का होगा।

अदालतों पर दबाव के संकेत इन बातों से मिलते हैं- जज केस छोड़कर, देश छोड़कर जा रहे हैं, अभियोजन पक्ष के एक वकील की हत्या हुई है। ऐसे में यह सोचना गलत होगा कि पाकिस्तान में भी न्यायपालिका उतनी ही स्वतंत्र होगी जितनी भारत, अमरीका या ब्रिटेन में है।

हाफ़िज़ व लखवी के खिलाफ क्यों नहीं जुटाए सबूत

पाकिस्तान भारत के सबूतों को स्वीकार ही नहीं करता है। लेकिन अगर पाकिस्तान को इन पर ऐतराज़ था तो उनकी टीम अमरीका और अन्य जगहों से भी इन्हें ले सकती थी।

इन लोगों के ख़िलाफ़ तकनीकी सबूत उपलब्ध थे जो यदि भारत के पास नहीं, तो अमरीकी संस्थाओं के पास थे। लेकिन अगर मंशा ही न हो तो कुछ भी कैसे साबित करेंगे? इस मामले में हाफ़िज़ सईद और लखवी नहीं पाकिस्तान सरकार और उसकी गुप्तचर सेवा अभियुक्त हैं।
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पाकिस्तान को बदलनी होगी नीति

फिलहाल तो इस मामले में कोई प्रगति हो ही नहीं सकती। ये तब तक संभव नहीं जब तक पाकिस्तान अपना रवैया नहीं बदलता। या फिर भारत और दुनिया ऐसे हालात पैदा नहीं करती कि पाकिस्तान चरमपंथ का समर्थन बंद कर दे।

पाकिस्तान को पहले नीति बदलनी होगी और इसके बाद भी हालात सुधारने में कई साल लग सकते हैं। पाकिस्तान की ओर से आ रहे बयानों से ये प्रतीत होता है कि नीयत नहीं बदली है, इरादा नहीं बदला है।

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