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भारत से है 32 देशों को खतरा, पाकिस्तान भी है उनमें से एक: पाक मीडिया

Sun, 22 May 2016 09:28 AM IST
अशोक कुमार/बीबीसी संवाददाता
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भारत की परमाणु क्षमता वाली पनडुब्बी और सुपर-सोनिक बेलेस्टिक मिसाइल के परीक्षण को लेकर पाकिस्तान के उर्दू मीडिया में कई तरह की आशंकाएं जताई जा रही हैं। ‘जंग’ लिखता है कि भारतीय पनडुब्बी में परमाणु मिसाइल तैनात करने से दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन बिगड जाएगा और इससे हिंद महासागर के तट पर स्थित 32 देशों को खतरा होगा। अखबार के मुताबिक ये बात पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के विदेश मामलों के सलाहकार सरताज अजीज ने पाकिस्तानी सीनेट में कही। अजीज ने इन 32 देशों में मालदीव, श्रीलंका, बहरीन, ईरान, इराक, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब, यूएई, मिस्र, दक्षिणी अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, म्यांमार, सिंगापुर और थाईलैंड जैसे देशों के नाम गिनाए। अखबार के मुताबिक अजीज ने कहा कि भारत संयुक्त राष्ट्र महासभा के आगामी सत्र में हिंद महासागर से परमाणु हथियारों को दूर रखने के इरादे से एक प्रस्ताव लाना चाहता है और इन सभी 32 देशों का समर्थन हासिल करने का प्रयास करेगा। वहीं ‘एक्सप्रेस’ लिखता है कि अजीज ने भारत की सुपर-सोनिक इंटरसेप्टर मिसाइल से पाकिस्तान को खतरे की बात भी की है।
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अखबार लिखता है कि पाकिस्तान को भी प्रतिरोधक क्षमता विकसित करनी होगी क्योंकि बात वार्ता की हो या फिर हथियारों की, पाकिस्तान ने हमेशा संतुलन बनाए रखने की नीति पर अमल किया है। वहीं रोजनामा ‘पाकिस्तान’ ने पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के इस बयान को तवज्जो दी है कि जब भी भारत बातचीत के लिए तैयार होगा, पाकिस्तान उससे बात करने को तैयार है। ये बात पाकिस्तान में भारतीय उच्चायुक्त गौतम बम्बावले के इस बयान के जबाव में कही गई है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पाकिस्तान में होने वाले सार्क सम्मेलन में हिस्सा लेंगे और उससे पहले दोनों देशों के बीच बातचीत होनी चाहिए। अखबार ने भारत पर हमेशा बातचीत में अडंगा लगाने का आरोप लगाते हुए लिखा है कि राजनयिक भाषा में जरूर कहा जाता है कि सभी विवादों पर बात होगी, लेकिन भारत की तरफ से कोई लचक नहीं दिखाई जाती है। 


वहीं रोजनामा ‘दुनिया’ लिखता है कि देश की संसद में सरकार और विपक्ष के मतभेद उस समय खत्म हो गए जब सांसदों ने अपने वेतन और अन्य सुविधाओं में लाखों रुपए की वृद्धि को मंजूरी दे दी। अखबार के मुताबिक सिफारिश की गई है कि राष्ट्रीय असेंबली के सदस्यों का बुनियादी वेतन 36,423 रुपए से बढाकर दो लाख, यूटिलिटी अलाउंस 50 हजार रुपए, ट्रांसपोर्ट अलाउंस 50 हजार रुपए, चुनाव क्षेत्र अलाउंस 70 हजार रुपए कर दिया गया है। वहीं राष्ट्रीय एसेंबली के स्पीकर और सीनेट के चैयरमैन का मासिक वेतन 97,124 रुपए से बढाकर चार लाख रुपए करने की सिफारिश की गई है जबकि उन्हें 50 हजार के अलाउंस अलग से देने की बात कही गई है। अखबार लिखता है कि वैसे तो विपक्ष को सरकार के हर काम में कीडे नजर आते हैं और उसके हर काम की आलोचना की जाती है लेकिन बात जब वेतन और सुविधाओं को बढाने की आती है तो सारे मतभेद खत्म हो जाते हैं। 
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‘औसाफ’ ने इस फैसले पर तंज करते हुए इसे आम लोगों के लिए बजट से पहले ‘खुशखबरी’ बताया है। अखबार लिखता है कि हद तो ये है कि सांसदों के परिजनों का अलग से ख्याल रखा गया है और उनके लिए वाउचर की मद में तीन लाख रुपए रखे गए हैं जबकि सांसद को अपना दफ्तर चलाने के लिए हर महीने एक लाख रुपए दिए जाएंगे। अखबार लिखता है कि होना तो ये चाहिए था कि देश की जनता के टैक्स से जमा पैसे को उन्हीं की बेहतरी में लगाया जाता लेकिन इसे सांसदों की फिजूलखर्ची पर लगाना जुल्म है। वहीं ‘जसारत’ ने पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी पर संपादकीय लिखा है कि सरकार को लोगों की सेहत से कोई सरोकार नहीं है। अखबार कहता है कि सवाल ये है कि जनता की किस चीज से सरकार को सरोकार है।  जसारत ने भी वेतन में भारी वृद्धि पर सांसदों की खिंचाई की है। रूख भारत का करें तो हालिया विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को लगे झटके की भारत के उर्दू मीडिया में खासी चर्चा है। ‘हमारा समाज’ लिखता है कि पांच राज्यों के नतीजों से पता चलता है कि कांग्रेस को बडे सबक लेने की जरूरत है। 


अखबार के मुताबिक आम ख्याल ये भी है कि बिहार चुनाव के बाद कांग्रेस जिस खुशफहमी का शिकार हो गई थी, वो उसकी जिल्लत का सामान बनी। अखबार कहता है कि कांग्रेस को जिस जवान जोश की जरूरत है वो पार्टी के भीतर मौजूद है, लेकिन जरूरत संगठित नेतृत्व और नई रूह की है जो उसे दोबारा हासिल करना होगा। अखबार के मुताबिक ये भी सोचना होगा कि मुसलमान क्यों कांग्रेस से दूर हो रहे हैं। वहीं ‘हिंदोस्तान एक्सप्रेस’ लिखता है कि अगर असम में कांग्रेस और मौलाना बदरुद्दीन अजमल की पार्टी के बीच समझौता हो जाता तो भाजपा ना तो 60 सीटें जीतती और न कांग्रेस 26 पर सिमटती। अखबार लिखता है कि विधानसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि आम चुनावों के दो साल बाद कांग्रेस अपनी बुनियाद मजबूत नहीं कर पाई है।
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अखबार के मुताबिक कांग्रेस की जडें जहां सूखती जा रही हैं, वहीं भारतीय जनता पार्टी का दायरा फैलता जा रहा है। 
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