पाकिस्तान में नवाज शरीफ की सरकार घरेलू मोर्चे पर लगातार सियासी और आर्थिक संकटों का सामना कर रही है।
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हाल में पाकिस्तान के स्कूलों पर आई रिपोर्ट हो या ईश निंदा की घटनाएं, देश की चरमराती सामाजिक सेवाओं पर भी सवाल उठे हैं। सरकार स्वास्थ्य, शिक्षा और अपने ही कामकाज की लाइलाज बीमारियों से बेखबर दिखाई देती है।
मोटे तौर पर देखें तो पाकिस्तान के सामने पांच बडी चुनौतियां हैं। ये हैं सूखे का सवाल, पानी का संकट, पोलियो के बढते मामले, पिछड़ती शिक्षा व्यवस्था और चरमपंथ।
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अगर सरकार इन सवालों पर कोई जवाब देती भी है तो उनके बयान समस्याओं की वजह और उनके असर को नकारने की शक्ल में होते हैं। मीडिया में अपने आलोचकों पर सख्त रवैया बरतने की बात भी सरकार कहती रही है।
इस्लामाबाद में हाल में हुए संयुक्त राष्ट्र के एक सम्मेलन में पाकिस्तान की 44 फीसदी आबादी के कुपोषित होने की बात उठाई गई, जिसमें 15 फीसदी की हालत तो बेहद खराब है।
सूखा और कुपोषण
नतीजतन इस सुस्त पडी़ विकास दर का खामियाजा पांच साल से कम उम्र के एक करोड दस लाख बच्चे भुगतेंगे। संयुक्त राष्ट्र के अन्य सर्वेक्षणों में भी इससे खराब निष्कर्ष निकाले गए हैं, हालांकि अभी तक ये रिपोर्ट प्रकाशित नहीं हुई हैं।
कुछ पश्चिमी कूटनयिकों का कहना है कि पाकिस्तान सरकार ने इनके प्रकाशन पर ऐतराज जताया था। लेकिन, पाकिस्तान में सरकार इन चुनौतियों पर बहुत कम ध्यान दे रही है।
कुपोषण के गंभीर मामलों की वजह अनाज की कमी नहीं, बल्कि इसका महंगा होना है। सिंध और बलूचिस्तान सूबों में खाद्य सामग्री के लिए पहले ही दंगे हो चुके हैं। सिंध के रेगिस्तानी इलाके थर पारकर में पिछले साल सूखा घोषित किया गया था।
गैर सरकारी संगठन तो मदद देने के लिए आगे आए, लेकिन सरकार की ओर से इस इलाके के लिए कोई दीर्घकालीन योजना नहीं रखी गई।
पानी का संकट इस तरह के विरोध प्रदर्शन अच्छी फसल देने वाले पंजाब सूबे तक भी पहुंच सकते हैं। पाकिस्तान में पानी को लेकर जारी संकट हर रोज बढता जा रहा है। आशंका जताई जा रही है कि अगले दशक तक सिंध और बलूचिस्तान में पानी खत्म हो जाएगा।
इसके बावजूद मॉनसून के दौरान इन इलाकों में बाढ और बारिश के पानी के प्रबंधन का कोई इंतजाम नहीं किया गया है।
पोलियो उन्मूलन
पाकिस्तान के पोलियो उन्मूलन अभियान को ग्लोबल इंडिपेंडेंट मॉनिटरिंग बोर्ड ने पूरी तरह से नाकाम बताया है। यह बोर्ड दुनिया में पोलियो उन्मूलन कार्यक्रमों पर निगरानी रखता है।
26 अक्तूबर को जेनेवा से जारी किए एक बयान में बोर्ड ने कहा है, "पाकिस्तान का पोलियो उन्मूलन अभियान 'एक त्रासदी' है।
पाकिस्तान में इस साल पोलियो के 217 मामले दर्ज किए गए। पोलियो उन्मूलन अभियान का विरोध करने वाले पाकिस्तानी तालिबान ने अभी तक पोलियो का टीका देने वाले 64 लोगों की हत्या की है।
अंदाजा लगाया जा सकता है कि पोलियो उन्मूलन अभियान से जुडे लोगों को किस तरह की सुरक्षा दी जा रही होगी। पोलियो अभियान में लगी नर्सों और दूसरे कर्मचारियों को दो महीनों से वेतन नहीं दिया गया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पाकिस्तान को अब इस बात के लिए भी शर्मिंदगी उठानी पड रही है कि उसके यहां से पोलियो का संक्रमण सीरिया, मिस्र और इसराइल में भी हो रहा है।
विदेश मंत्रालय ने अपनी सफाई में अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर समस्या को बढा-चढाकर पेश करने का आरोप लगाया। ये और बात थी कि अगले ही दिन इस बयान को वापस ले लिया गया।
पाकिस्तान में आज भी ऐसे हालात हैं कि ढाई करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं। यह दुनिया के किसी भी देश की तुलना में सबसे बडी़ संख्या है।
हाल ही में आई एक नई रिपोर्ट 'अलिफ एलान' में कहा गया है कि पाकिस्तान के स्कूलों में दाखिला लेने वाले चार बच्चों में से सिर्फ एक बच्चा ही दसवीं कक्षा तक पहुंच पाता है।
आधे बच्चे पांचवीं क्लास तक पहुंचते-पहुंचते स्कूलों से बाहर हो जाते हैं, जबकि स्कूलों की स्थिति पानी, शौचालय और यहां तक कि स्कूल के कमरों की स्थिति दयनीय है।
हालांकि पंजाब सूबे की सरकार ने स्कूलों की स्थिति सुधारने के लिए बडी रकम खर्च की है, लेकिन बीते सालों में स्थिति बहुत ज्यादा नहीं बदली है।
ईश निंदा पाकिस्तान के अल्पसंख्यक समुदाय की स्थिति भी कोई बेहतर नहीं कही जा सकती है। उनके खिलाफ हिंसा के मामले लगातार बढ रहे हैं।
चार नवंबर को ईशनिंदा के आरोप में एक ईसाई जोडे की हत्या कर दी गई और उन्हें जला दिया गया। हालांकि बाद में ऐसी बातें भी कहीं गईं कि उनकी हत्या की वजह कुछ और थी।
प्रदूषण नियंत्रण से लेकर पोलियो उन्मूलन अभियान चरमपंथियों की चुनौती की वजह से नाकाम रहे। और जब चरमपंथियों के खिलाफ ही कोई स्पष्ट रणनीति नहीं हो कोई अभियान कैसे चलाया जा सकता है।
राष्ट्रीय आंतरिक सुरक्षा नीति की फरवरी में घोषणा हुई थी, लेकिन इसके बाद से इस बारे में कुछ सुनने को नहीं मिला है।