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भारत फांसी दे तो ठीक, पाक दे तो दिक्कत

Sun, 21 Dec 2014 07:51 PM IST
अशोक कुमार/बीबीसी संवाददाता
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पेशावर में पिछले दिनों एक आर्मी स्कूल पर हुए हमले पर ही खास तौर से पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में चर्चा हो रही है। नवा-ए-वक्त का संपादकीय है- दहशतगर्दों, उनके मददगारों और समर्थकों, सबके के खिलाफ ऑपरेशन लाजिमी।
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अखबार लिखता है कि देश में पंख फैलाते दहशतगर्दों के खिलाफ बिना किसी भेदभाव के पहले ही कार्रवाई शुरू कर दी गई होती तो 'हमें वाघा बॉर्डर और पेशावर आर्मी स्कूल जैसे हमले न झेलने पड़ते।'

अखबार कहता है कि देर आयद दुरुस्त आयद ही सही, लेकिन अब इस नासूर को पूरी तरह खत्म करने के लिए दहशतगर्दों, उनके हमदर्दों और समर्थकों के खिलाफ निर्णायक अभियान जरूरी है, क्योंकि इसी पर पाकिस्तान का अस्तित्व और भविष्य का दारोमदार टिका है।
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बर्बरता की कोई मिसाल नहीं

दैनिक खबरें ने लिखा है कि 13 साल से दहशतगर्दी की आग में जल रहे मुल्क का सब्र का पैमाना लबरेज हो चुका है और उसके कंधे लाशें उठा-उठाकर थक चुके हैं, लेकिन अब उसने खून की होली खेलने वालों को उन्हीं की जुबान में जवाब देने का फैसला कर लिया है।

अखबार लिखता है कि 16 दिसंबर का दिन पहले भी बांग्लादेश के अलग होने की वजह से पाकिस्तान के लिए काले दिन की हैसियत रखता था, लेकिन इसी दिन पेशावर के स्कूल में जो बर्बरता हुई, उसकी अतीत में कोई मिसाल नहीं मिलती।

रोजनामा दुनिया लिखता है कि पूरा देश आपसी मतभेदों को भुला कर दहशतगर्दों को ऐसी सजा देने पर तुल गया है कि वो आने वाले दिनों के लिए भी मिसाल हो।

अख़बार लिखता है कि दहशतगर्दी से निपटने के कई प्रस्ताव सामने आए हैं और एक राष्ट्रीय एक्शन प्लान कमेटी भी बनी है। साथ ही, कुछ यूरोपीय देशों के दबाव में मौत की सजा पर लगाई गई रोक भी अब हटा ली गई है।

इसका मतबल है कि जिन चरमपंथियों को अदालतों से मौत की सज़ा मिली है और उनकी दया याचिका खारिज हो चुकी है, उन्हें फौरन फांसी पर लटकाया जाएगा।
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फांसी पर जारी है बहस

औसाफ ने पाकिस्तान में मौत की सजा पर रोक हटाने के फैसले पर यूरोपीय संघ की आपत्ति को खारिज किया है। अखबार कहता है कि 'दहशतगर्द हमारे बच्चों का क़त्ले आम कर रहे हैं और यूरोपीय संघ अब भी पाकिस्तान में मौत की सजा का विरोध कर रहा है।'

अख़बार के मुताबिक़ भारत सजा-ए-मौत दे तो यूरोपीय संघ को कोई दिक्कत नहीं है, अमरीका, अफगानिस्तान, ईरान और सऊदी अरब फांसियां दे तो कोई समस्या नहीं, लेकिन पाकिस्तान में सजा-ए-मौत पर यूरोपीय संघ को तकलीफ है। उधर रोजनामा एक्सप्रेस भी लिखता है कि दहशतगर्दों से कोई रियायत न बरती जाए।

रुख़ भारत का करें तो दिल्ली से छपने वाले हिंद न्यूज का संपादकीय है - पार्टी नेताओं की जहरीली बयानबाजी पर पीएम मोदी की खामोशी। अखबार लिखता है कि लगता है नरेंद्र मोदी अपनी खामोशी के जरिए सांप्रदायिक ताक़तों की अप्रत्यक्ष तौर पर हौसला अफजाई ही कर रहे हैं। इसलिए जरूरी है कि वो चुप्पी तोड़ें और अपना रुख़ साफ करें।

हिंदोस्तान एक्सप्रेस ने भी इसी विषय को अपने संपादकीय में उठाया है और शीर्षक है- बेलगाम जुबान। अखबार के मुताबिक़ प्रधानमंत्री मोदी अपनी पार्टी के नेताओं को लक्ष्मण रेखा पार न करने की हिदायत देते हैं, लेकिन एक के बाद एक विवादास्पद बयान आ रहे हैं।

अखबार कहता है कि विडंबना यह है कि भाजपा नेता समझ नहीं रहे हैं कि वो सत्ता में हैं और उनके ऐसे बयानों से जनता में उनकी नकारात्मक छवि ही बनेगी।
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