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पाकिस्तानी महिलाओं के लिए हर पुरुष की आंखों में नफरत क्यों?

Thu, 12 Oct 2017 02:28 PM IST
आमिना मुफ्ती
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"कराची शहर में एक जुनूनी शख्स औरतों पर तेज धार हथियार से वार करता घूम रहा है। डेढ़ दो हफ्ते में बारह से अधिक औरतों को जख्मी किया गया है। दोषी अभी तक आजाद है।" ये खबर पढ़ के मुझे जरा भी डर नहीं लगा क्योंकि मैं इस कदर डर चुकी हूं कि अब डर की गुंजाइश ही नहीं है। बचपन ही से हर मर्द रिश्तेदार, कर्मचारी, दुकानदार, शिक्षक, दोस्त, कजन, भाई, बहनोई की आंख में नफरत और आपराधिक चमक हमारे समाज की हर औरत देखती आई है।
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बच्ची के पैदा होते ही बाप को डराया जाता है, 'बेटी वाले हो'। इस गाली को सुन के बाप के कंधे झुक जाते हैं और मां जीते जी मर जाती है। गोद से लेकर स्कूल जाने की उम्र तक मां बच्ची पर चील की नजर रखती है और चुपके-चुपके बताती रहती है कि बच्ची कोई ज्यादा नजदीक आए, टॉफी के बहाने बुलाए, छूने की कोशिश करे तो पास मत जाना, अंकल बहुत गंदे होते हैं।

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मां झूठी नहीं होती
बच्चियां हैरत से झूठी मां को देखती रहती हैं। मगर जो ही घर से निकल कर स्कूल जाने की उम्र आती है तो उन्हें पता चल जाता है कि मां झूठी नहीं थी। गली के नुक्कड़ पर हुक्का गुड़गुड़ाते जगत दादा जी, वैन वाले अंकल, शॉप वाले भाईजी, यूनिफॉर्म की दुकान वाले शाह जी, सब के सब बेखबर मासूम बच्चियों का उत्पीड़न करने में समान रूप से लगे होते हैं।
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ढीठ लड़कियां जरा बड़ी हो जाती हैं तो गली मोहल्ले के ताजा-ताजा जवान हुए लौंडे, खालाजाद, चचाजाद, सब जाद डराने वाले अंदाज में इजहार-ए-इश्क को फड़कते फिर रहे होते हैं। उनसे बचने को कच्ची-पक्की उम्रों में घबरा के 'एक जरा कम जरूर भेड़िये' से शादी को हां कर दी जाती है। तब ये राज खुलता है कि जिस आर्थिक सुख और चारदीवारी की सुरक्षा के लिए ये कदम उठाया गया था वो तो यहां भी नहीं है।

अलग-अलग हिस्से खुजलाते मर्द

चीखता चिल्लाता, मारता-पीटता, हर वक्त चरित्र की सफाई के सबूत मांगता पति, बदन टटोलते नजरों वाले देवर-जेठ, बहाने-बहाने से टांगें दबवाने वाला ससुर और गुसलखाने की झिर्रियों से झांकने वाले नंदोई इस चारदीवारी में भी राक्षसों की तरह मंडरा रहे होते हैं।

घर के बाहर जरूरत का सामान लेने निकलती हैं तो दुकानों पर, गलियों बाजारों में अश्लील गाने गाते, खुलेआम जिस्म के अलग-अलग हिस्से खुजलाते मर्द जिनकी जबान पर मां-बहन की गाली और जिस्म में औरत के खिलाफ जुर्म का जज्बा लगातार उछलता रहता है।

जरा अधिक ढीठ लड़कियां जो किसी न किसी तरह अपना आर्थिक बोझ खुद ढोने की कोशिश कर लेती हैं उनके सामने उन मुजरिमों की सबसे भयानक किस्म आती है। राल बहाते अफसर, यौन हिंसा से भरी आंखों वाले दफ्तर के साथी और उनकी नैतिकता पर नजर रखने वाला स्टाफ।
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काने-टेढ़े को खुशफहमी

सबसे ढीठ औरतें वो हैं जो जिंदगी की किसी न किसी मैदान में किसी तरह शोहरत हासिल कर लेती हैं। उनके सब्र की दाद न देना बहुत नाइंसाफी होगी। सबसे पहले तो ये मान लिया जाता है कि ये बुरे चरित्र की है। शरीफ होती तो गली के चाचे से ही न बच पाती।

उसके बाद हर काने-टेढ़े को यह खुशफहमी हो जाती है कि इन औरतों का इस दुनिया में आने और यहां तक पहुंचने का एक ही मकसद है और वो है उनकी दिल की धड़कन। पहाड़-सी जिंदगी, मेहनत कर करके इसलिए गुजारी कि एक रोज उनकी कीच भरी उन आंखों में मोहब्बत नजर आ जाए।

औरत तो बुद्धिमान हो ही नहीं सकती इसलिए वह जो कुछ करती है या तो वो किसी की मेहरबानी का नतीजा है या कोई मर्द ही उसके हिस्से का काम कर रहा है। अभिनेत्रियों पर किए जाने वाले हमले बहुत कुछ बयान करते हैं। कामयाब औरत पर उठने वाले खंजर तो ऐसे जहर से बुझे होते हैं कि अगर असली इंसान की रूह को देखा जा सकता है तो इन औरतों की रूह साफ नजर आएगी।

ऐसे समाज में अगर एक शख्स खुले आम खंजर लेकर औरतों पर हमला कर रहा है तो हैरत कैसी? उसे तलाश करना है तो सीसीटीवी नहीं आईना देखिए। फिर भी न मिले तो ढूंढने की मेहनत न करें, वो नहीं मिलने वाला।
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