पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच जारी जंग को रुकवाने की कूटनीतिक कोशिशें लगातार असफल होती जा रही हैं। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच चीन द्वारा मध्यस्थता की कोशिश भी अब ठंडे बस्ते में पड़ती नजर आ रहे हैं।
पाकिस्तान द्वारा अपने सदाबहार दोस्त माने जाने वाले चीन की भी बात न सुनने की यह स्थिति बीजिंग के प्रभाव पर सवाल खड़े कर रही है। अंतरराष्ट्रीय पत्रिका 'द डिप्लोमैट' की रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन के विदेश मंत्रालय ने दावा किया कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान दोनों ने मुद्दों को हल करने की इच्छा व्यक्त की है। इसके बावजूद चीन की मध्यस्थता पर पाकिस्तान की ओर से शुरुआती प्रतिक्रिया उदासीन रही है।
संघर्ष ने क्यों बढ़ाई चीन की चिंता?
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच छिड़े इस नए संघर्ष ने चीन के लिए चिंता बढ़ा दी है। दरअसल, चीन दोनों देशों का एक प्रमुख सहयोगी, आर्थिक भागीदार और पड़ोसी है। अपनी महत्वपूर्ण रुचियों को देखते हुए बीजिंग ने सक्रिय रूप से संघर्ष को हल करने के प्रयासों को तेज कर दिया है।
रिपोर्ट के अनुसार कतर, सऊदी अरब और तुर्किये द्वारा पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच मध्यस्थता के प्रयास पहले ही असफल हो चुके थे। इसके बाद चीन ने अपने पड़ोस में छिड़े इस संघर्ष को हल करने की कोशिश शुरू की।
संघर्षविराम के बाद फिर शुरू हुआ युद्ध
पाकिस्तान ने इसे खुली जंग घोषित कर रखा है। यह संघर्ष पिछले साल अक्टूबर में शुरू हुआ था, जब पाकिस्तान और अफगानिस्तान दोनों ने एक-दूसरे के क्षेत्र में हमले किए थे। हालांकि कतर, सऊदी अरब और तुर्किये की मध्यस्थता से एक युद्धविराम हुआ था, लेकिन अनसुलझे मूल मुद्दों के कारण दोनों पक्षों के हमले फिर से शुरू हो गए।
चीन की कोशिशों पर कैसा रहा पाकिस्तान का रुख?
रिपोर्ट में बताया गया है कि 27 फरवरी को पाकिस्तान द्वारा तालिबान के खिलाफ ऑपरेशन गजब-लिल-हक शुरू करने के बाद चीन ने गहरी चिंता व्यक्त की थी। चीन ने दोनों पक्षों से संयम बरतने, बातचीत के जरिए मतभेदों और विवादों को हल करने और जल्द से जल्द लड़ाई खत्म करने का आग्रह किया था।
मार्च के पहले और दूसरे सप्ताह में चीन ने अपनी मध्यस्थता के प्रयासों को तेज किया। इस दौरान अफगानिस्तान के लिए उसके विशेष दूत यू शियाओयोंग ने दोनों देशों के बीच युद्धविराम कराने के उद्देश्य से इस्लामाबाद और काबुल का दौरा किया। चीन के विदेश मंत्रालय ने पुष्टि की कि यू शियाओयोंग ने 7 से 14 मार्च के बीच अफगानिस्तान और पाकिस्तान का दौरा कर हालिया संघर्षों के संबंध में मध्यस्थता की।
हालांकि, पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए 'द डिप्लोमैट' ने कहा कि इस्लामाबाद ने बीजिंग के इन प्रयासों को अस्वीकार कर दिया है। इसका मुख्य कारण अफगानिस्तान में आतंकवादी समूहों की उपस्थिति पर तालिबान का अपरिवर्तित रुख बताया गया है, जिसे तालिबान शासन लगातार नकारता रहा है।
मध्यस्थता की कोशिशें क्यों हो रहीं असफल?
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच चीन के मध्यस्थता प्रयासों का नतीजा नहीं निकल रहा है। चीन के प्रयासों पर पाकिस्तान की उदासीन प्रतिक्रिया दो अलग-अलग परिदृश्यों की ओर इशारा करती है। पहला, पाकिस्तान वास्तव में तालिबान के साथ कोई सौदा करने में रुचि नहीं रखता है। इसमें अफगानिस्तान से संचालित होने वाले आतंकवादी समूहों का खतरा पूरी तरह से खत्म नहीं हो जाता है।
हालांकि, तालिबान शासन आतंकी समूहों को पनाह देने को नकारता रहा है। वहीं, पाकिस्तान इन आतंकी समूहों को तालिबान की मदद से हो या उसके बिना ही खत्म करना चाहता है। दूसरा, डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के तहत अमेरिका के साथ पाकिस्तान की बढ़ती निकटता ने उसे चीन की इच्छाओं को धता बताने के लिए पर्याप्त लाभ दिया है।
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