नेपाल में प्रधानमंत्री ओली की कुर्सी और भविष्य पर मंडरा रहे संकट के बीच राजनीतिक गलियरों में हलचलें तेज हैं। संसद का बजट सत्र बीच में ही खत्म करवा कर ओली अब तेजी से नई पार्टी बनाने की मुहिम में जुट गए हैं।
माना ये जा रहा है कि अब ओली अपनी सरकार बचाने के लिए नेपाली कांग्रेस से हाथ मिला सकते हैं। इसके लिए उन्होंने नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शेर बहादुर देउबा से मुलाकात भी की है। नेपाली कांग्रेस भी ओली को बाहर से समर्थन देने के लिए तैयार है।
अगर नेपाली संसद के गणित पर नजर डालें, तो इस वक्त 275 सदस्यों वाली संसद में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी अपने 174 सांसदों के साथ बहुमत में है। 2017 में हुए चुनावों में नेपाल की दोनों कम्युनिस्ट पार्टियां- ओली की सीपीएन-यूएमएल और प्रचंड की सीपीएन (एमसी) –मिलकर लड़ी थीं और जबरदस्त बहुमत हासिल किया था।
फिर 17 मई 2018 को दोनों पार्टियों में विलय हो गया था। इसके बावजूद पार्टी के भीतर सत्ता संघर्ष जारी रहा और सीपीएन (एमसी) में भी पुष्प कमल दहल प्रचंड और माधव कुमार नेपाल का खेमा अलग अलग नजर आता रहा।
इन 174 सासंदों में ओली समर्थक 78 से 80 सांसद बताए जा रहे हैं, जबकि प्रचंड समर्थक 53 और माधव नेपाल समर्थक 43 सांसद। दूसरी तरफ नेपाली कांग्रेस के इस वक्त 63 सांसद हैं।
अगर ओली पार्टी तोड़कर अलग पार्टी बनाते हैं, तो उन्हें अपने 80 सांसदों के अलावा बहुमत के लिए करीब 58 से 60 सांसदों की ओर जरूरत पड़ेगी। सरकार बनाने के लिए नेपाल में जरूरी सांसदों की संख्या 138 होनी चाहिए। ऐसे में अगर ओली को कांग्रेस का समर्थन मिल जाता है तो उनकी राह आसान हो जाएगी।
उधर नेपाली कांग्रेस के नेता बिमलेन्द्र निधि ने काठमांडू पोस्ट को बताया कि उनकी पार्टी ओली का समर्थन कर सकती है, लेकिन सरकार में शामिल नहीं होगी।
दूसरी तरफ ओली की नजर अपनी पार्टी के भीतर प्रचंड और नेपाल खेमे के सांसदों पर भी है और उन्हें भरोसा है कि उनमें से कुछ उनके पक्ष में जरूर आएंगे।
सत्ता के इस खेल में अभी भी प्रचंड खेमा पिछड़ता दिखाई दे रहा है और ओली को हटाने की मुहिम बहुत कामयाब होती नहीं दिख रही है। ऐसे में राष्ट्रपति का ओली को आंख बंद कर समर्थन देना और उनके इशारों पर काम करना ओली का पलड़ा और मजबूत करता है।