यूरोपियन यूनियन के सदस्य देशों के बीच पर्यावरण संरक्षण के अनुरूप कृषि नीति में बदलाव पर सहमति नहीं बन सकी है। नई साझा कृषि नीति तैयार करने के लिए ब्रसेल्स में चली चार दिन की वार्ता बिना किसी नतीजे पर पहुंचे खत्म हो गई। यूरोपीय संसद के पर्यावरणवादी सदस्य इस नीति में पर्यावरण सम्मत खेती के लिए 270 यूरो का बजट रखने की मांग कर रहे थे। लेकिन सरकारें इस पर सहमत नहीं हुईं।
जानकारों ने कहा है कि बातचीत टूटने के बाद अब साझा नीति बन सकने की संभवना बहुत घट गई है। हालांकि आधिकारिक तौर पर कहा गया है कि जून में वार्ता फिर शुरू होगी, लेकिन सरकारों, ईयू के अधिकारियों और यूरोपीय संसद के सदस्यों के बीच जितने गहरे मतभेद सामने आए, उसे देखते हुए जून में भी कोई सहमति बन पाएगी, इसकी उम्मीद नहीं है। जानकारों ने ध्यान दिलाया है कि साझा कृषि नीति बनाने की कोशिश में पहले ही दो साल की देर हो चुकी है। इस कारण ईयू के एक करोड़ किसान खेती संबंधी भावी नीति को लेकर अंधकार में हैं।
यूरोपियन पीपुल्स पार्टी के सांसद हर्बर्ट डॉर्फमैन ने वेबसाइट पॉलिटिको.ईयू से कहा- ‘ईयू के कुछ सदस्य देश नई नीति अपनाने को लेकर शून्य इच्छा रख रहे हैं। वे कुछ भी बदलना नहीं चाहते। वे ऐसा सुधार चाहते हैं, जिससे कुछ भी ना बदले।’ पिछले हफ्ते उस समय ही किसी समझौते की संभावना धूमिल हो गई थी, जब कुछ देश उससे भी पीछे हट गए, जिसके लिए वे पहले तैयार हो गए थे।
साझा कृषि नीति के प्रस्ताव में ‘जलवायु संरक्षण योजना’ पर एक बड़ा बजट खर्च करने की बात शामिल है। लेकिन बातचीत के दौरान इस योजना पर कुल कृषि बजट के 18 फीसदी हिस्से से ज्यादा खर्च करने पर देशों के बीच सहमति नहीं बनी। जबकि प्रस्तावित योजना में ये खर्च 30 फीसदी रखने की बात शामिल है। इस योजना के तहत कृषि वनीकरण और जैविक खेती को बढ़ावा देने की बातें शामिल हैं। कुछ देशों ने तर्क दिया कि उनके यहां किसान ऐसे कार्यक्रमों के लिए तैयार नहीं होंगे। उन्होंने कहा कि इसलिए समझौता लचीला होना चाहिए, ताकि कोई देश उससे बचना चाहे तो वह ऐसा कर पाए।
दूसरी तरफ बातचीत में शामिल यूरोपीय संसद के सदस्यों ने सभी देशों के सामने सुझाव रखा कि वे कहीं अधिक महत्वाकांक्षी ग्रीन न्यू डील (नव हरित समझौते) की तरफ बढ़ाने का इरादा दिखाएं। उन्होंने कहा कि अगर ईयू से सब्सिडी मिलेगी और उसे किसानों तक पहुंचाया जाएगा, तो किसान नए ढंग से खेती करने पर सहजता से राजी हो जाएंगे। इसलिए असल मुद्दा यह है कि खेती में ग्रीन निवेश के लिए कितना बजट तय किया जाता है।
पुर्तगाल ने इस मामले में महत्वाकांक्षी प्रस्ताव यूरोपीय संसद में पेश कर दिया था। उससे पर्यावरणवादी सदस्य उत्साहित हुए। चूंकि प्रस्ताव संसद में आ चुका है, इसलिए सांसदों की भी बातचीत में भूमिका बन गई। अब मामला लटक जाने पर कई यूरोपीय देशों ने इसके लिए पुर्तगाल को दोषी ठहराया है। उन्होंने कहा है कि पुर्तगाल ने प्रस्तावों को संसद में पेश कर भारी गलती की। उसके बाद घोषित लक्ष्यों से कम पर समझौता करना मुश्किल हो गया है।