नेपाल की सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिए गए संसद बहाली के आदेश के बाद प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को हटाने के लिए नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का दहल गुट तमाम राजनीतिक पार्टियों से मदद मांगने की कवायद में जुट गया है। दहल गुट चाहता है कि नेपाली कांग्रेस और जनता समाजवादी पार्टी जैसे दल एक साथ आ जाएं ताकि ओली को हटाया जा सके।
इसी कड़ी में पुष्प कमल दहल और माधव कुमार नेपाल ने जनता समाजवादी पार्टी (नेपाल) के नेताओं से मुलाकात की। इन दोनों नेताओं ने जेएसपी-एन के महंथ ठाकुर, राजेन्द्र महतो और राजेन्द्र श्रेष्ठा से मिलकर ओली को हटाने के लिए समर्थन मांगा और कहा कि ओली के मनमाने फैसलों से नाराज सभी दलों को मिलकर एक मोर्चा बनाने की जरूरत है। ऐसे समय में जब सुप्रीम कोर्ट ने 13 दिनों के भीतर संसद का सत्र बुलाने और ओली को सदन में विश्वास मत लाने को कहा है, ऐसे में ओली को सदन में हराकर ये सभी दल मिलकर एक लोकतांत्रिक सरकार बना सकते हैं।
दहल और माधव कुमार नेपाल नेपाली कांग्रेस के नेताओं से मिलने वाले हैं। नेपाली कांग्रेस और जेएसपी-एन समेत कई और छोटे दल हैं जो लगातार ओली सरकार का विरोध करते रहे हैं और उन पर भ्रष्टाचार से लेकर मनमाने फैसले लेने का आरोप लगाते रहे हैं। अब दहल चाहते हैं कि इन्हीं पार्टियों को साथ जोड़कर एक नया गठबंधन बनाया जाए।
हालांकि इसमें अभी कई पेंच हैं। जेएसपी-एन के नेता ये कह रहे हैं कि अभी तक यही तय नहीं हो पाया है कि एनसीपी का असली नेता कौन है और पार्टी को कौन चला रहा है, ओली या दहल। ओली अब भी खुद को पार्टी का असली मुखिया बताते हैं जबकि दहल गुट दावा करता है कि ओली को एनसीपी से निकाला जा चुका है। ऐसे में एनसीपी की तरफ से सिर्फ ओली गुट से बात करके ये कैसे तय किया जा सकता है। पहले तो पार्टी का औपचारिक विभाजन हो तभी संवैधानिक तौर पर कोई ऐसा मोर्चा बन सकता है।
दूसरी तरफ ऐसे मोर्चे को लेकर एक बड़ा पेंच ये है कि जेएसपी-एन मूल रूप से मधेसियों की पार्टी है और नेपाल में मधेस के आंदोलन की सबसे मजबूत आवाज रही है। पार्टी के नेता राजेन्द्र महतो कहते हैं कि जब नेपाल का नया संविधान बन रहा था तो नेपाली कांग्रेस ने सबसे पहले मधेसियों के आंदोलन को कुचलने की कोशिश की। उसके बाद नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी बनने से पहले सीपीएन-यूएमएल और माओवादियो ने भी मधेस आंदोलकारियों पर जुल्म ढाये और उन्हें दरकिनार किया।
संविधान में मधेसियों को दोयम दर्जे का नागरिक माना गया और अधिकारों में कटौती की गई। यहां तक कि आज भी कई प्रमुख मधेसी नेता जेल में हैं और उनकी पार्टी अदालत में मुकदमे लड़ रही है। यहां तक कि एनसीपी सरकार बनने के बाद भी मधेसियों को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए और न ही इन नेताओं को रिहा किया गया।
ऐसे में ओली के खिलाफ अगर कोई मोर्चा बनता भी है तो उसकी पहली शर्त होगी कि संविधान में संशोधन करके मधेसियों को बराबरी का दर्जा दिया जाए, उनके अधिकारों को बहाल किया जाए और जेलों में बंद सभी आंदोलनकारी नेता बिना शर्त रिहा किए जाएं।
जेएसपी-एन के नेताओं ने कहा कि दहल और नेपाल समर्थन मांगने और एक होने का प्रस्ताव लेकर तो जरूर आए, लेकिन हमारे इन अहम सवालों पर कोई ठोस जवाब नहीं दे पाए। जब तक कोई लिखित समझौता और मधेसियों के अधिकार बहाली का समझौता नहीं होता, ये समझौता कैसे हो सकता है।
कई नेता अभी भी इसे दहल और ओली की आपसी लड़ाई का नतीजा मानते हैं और कहते हैं कि देश की बेहतरी के लिए इन दोनों नेताओं से अलग कोई विकल्प चाहिए। उन्हें संदेह है कि सत्ता अगर दहल के पास भी आ जाती है तो कमोबेश स्थितियों में कोई सुधार नहीं होने वाला।