चौतरफा आलोचनाओं और अपनी ही पार्टी में जबरदस्त विरोध की वजह से आखिरकार नेपाल की ओली सरकार ने अपना फैसला पलट दिया और दोनों विवादास्पद अध्यादेश वापस ले लिए। 20 अप्रैल को प्रधानमंत्री ओली ने बगैर विपक्षी दलों और यहां तक कि अपनी ही पार्टी के प्रचंड गुट को भरोसे में लिए अफरातफरी में दो अध्यादेश कैबिनेट से पास करवा कर राष्ट्रपति की मुहर भी लगवा दी थी।
आखिरकार शुक्रवार को ओली को कैबिनेट की आपात बैठक बुलानी पड़ी और दोनों विधेयक वापस लेने पड़े। राष्ट्रपति बिद्यादेवी भंडारी ने अपने पुराने फैसले को रद्द करने का अध्यादेश भी जारी कर दिया।
नेपाल के सियासी हलकों में कोरोना संकट के इस गंभीर माहौल और लॉकडाउन के हालात के दौरान लिए गए ओली के इस फैसले से खासी नाराज़गी थी। यहां तक कि नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के मजबूत नेता पुष्प कमल दहाल प्रचंड ने भी इस फैसले पर ताज्जुब जताते हुए इसके विरोध किया था और पार्टी की आपात बैठक बुलाकर इसे वापस लेने को कहा था।
इन दोनों अध्यादेशों में से एक के तहत संवैधानिक समिति के कामकाज में किसी और की दखल खत्म करके नियुक्तियों का अधिकार सीधे प्रधानमंत्री और समिति के सदस्यों को दिया गया था और सबसे अहम दूसरे अध्यादेश में राजनीतिक दलों के असंतुष्टों को अलग पार्टी बनाने का रास्ता आसान कर दिया गया था।
इसका तत्काल असर देखने को मिला और राष्ट्रीय जनता दल और समाजवादी पार्टी के असंतुष्टों ने रातोंरात पार्टी तोड़कर एक अलग संयुक्त पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया। मधेसियों के इलाके में इन पार्टियों का अच्छा खासा दबदबा है और नेपाली संसद में इन दोनों के 33 सांसद हैं।
प्रधानमंत्री ओली पर आरोप लग रहे थे कि उन्होंने ये कदम इन पार्टियों को तोड़ने और इन्हें अपने साथ खड़ा करने के मकसद से उठाया था। ये भी आरोप लगाया गया कि इस गुट को इसके लिए उन्होंने डिप्टी स्पीकर और दो मंत्री पद देने का लालच भी दिया था।
ऐसे तमाम आरोपों और अपनी ही पार्टी में बुरी तरह घिर गए के पी शर्मा ओली को आखिरकार ये फैसला तत्काल प्रभाव से वापस लेना पड़ा।
गौरतलब है कि गुरुवार को पुष्प कमल दहाल प्रचंड ने अपनी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को भरोसा दिलाया था कि नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के एकीकरण से बौखलाई ताकतें पार्टी में दरार डालने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन ऐसा कतई नहीं होगा और उनकी साजिशें नाकाम होंगीं।
प्रचंड ने कहा था कि इतने सालों के संघर्ष के बाद नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टियां एक होकर एक मजबूत सरकार चला रही हैं, जो देश हित में और नेपाल के विकास के लिए गंभीरता से काम कर रही है, ऐसे में सियासी साजिशों से सावधान रहने की जरूरत है।
जाहिर है कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर ओली का यह विरोध और इस मनमाने फैसले ने ये तो साबित कर ही दिया है कि ओली और प्रचंड गुटों के बीच गंभीर असहमतियां हैं और दोनों ही गुट एक दूसरे पर हावी होने की कोशिशें करता रहा है।
ऐसे में ये फैसला पलटने को मजबूर होने के बाद ये साफ हो गया है कि अभी प्रचंड गुट का असर पार्टी के भीतर काफी मजबूत है।