काठमांडो में गैस संकट ने अब आम जिंदगी को बुरी तरह प्रभावित करना शुरू कर दिया है। राजधानी में खाना पकाने वाली गैस की कमी से परेशान छात्रों ने गुरुवार को अपने खाना पकाने के बर्तन लेकर सड़क का रुख किया। छात्रों ने रत्न राज्य लक्ष्मी कैंपस के प्रवेश द्वार के बाहर लकड़ी जलाकर चावल और गुंद्रुक-आलू की सब्जी बनाई। खाना तैयार होने के बाद छात्रों ने वहीं बैठकर भोजन किया और आसपास मौजूद लोगों को भी खिलाया। यह प्रदर्शन केवल सरकार के खिलाफ विरोध नहीं था, बल्कि गैस की कमी के कारण लोगों को हो रही रोजमर्रा की परेशानी दिखाने का एक तरीका भी था।
छात्रों ने सड़क पर खाना क्यों बनाया?
छात्रों ने बताया कि सरकार लोगों के लिए पर्याप्त खाना पकाने वाली गैस उपलब्ध नहीं करा पा रही है और रोजमर्रा की जरूरी चीजों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। प्रदर्शनकारी छात्र मदन ढकाल ने कहा कि छात्र और आम लोग दोनों इस समस्या से जूझ रहे हैं। इसी परेशानी को दिखाने के लिए छात्रों ने सड़क किनारे लकड़ी से खाना पकाया। उनका कहना था कि गैस नहीं मिलने के कारण कई छात्रों की दिनचर्या और पढ़ाई तक प्रभावित हो रही है। गैस डिपो के बाहर घंटों कतार में खड़े होने के बावजूद सिलेंडर नहीं मिल रहा है। कई छात्रों ने छात्रावास में खाना बनाना ही बंद कर दिया है और नूडल्स तथा बिस्कुट के सहारे गुजारा कर रहे हैं।
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करीब 40 लोगों को खाना खिलाने की जरूरत क्यों पड़ी?
छात्रों ने इस प्रदर्शन के दौरान केवल खाना पकाया ही नहीं, बल्कि उसे छात्रों और राहगीरों में बांटा भी। मदन ढकाल के मुताबिक, करीब 40 लोगों ने उस दिन खाना खाया और यह व्यवस्था पूरे दिन जारी रखने की योजना थी। छात्रों ने खास तौर पर उन लोगों को खाना देने की कोशिश की, जो गैस की कमी के कारण ठीक से भोजन नहीं कर पा रहे हैं। चावल और गुंद्रुक-आलू की सब्जी बनाकर लोगों को खिलाने का मकसद यह बताना था कि खाना पकाने की एक बुनियादी जरूरत अब लोगों के लिए परेशानी बन गई है। यह संकट खासकर काठमांडो और आसपास के इलाकों में ज्यादा गंभीर है, जहां गैस पर निर्भरता देश के दूसरे हिस्सों की तुलना में अधिक है।
वैकल्पिक रास्तों से गैस पहुंचाने की कोशिश कितनी सफल रही?
- नेपाल ऑयल कॉरपोरेशन ने कहा है कि जब तक पृथ्वी हाईवे नहीं खुलता, तब तक तराई जिलों के प्लांट में एलपीजी सिलेंडर भरकर वैकल्पिक रास्तों से काठमांडो पहुंचाए जाएंगे। इसके तहत गुरुवार को 24,494 सिलेंडर काठमांडो घाटी पहुंचे थे। शुक्रवार को यह संख्या बढ़कर 34,134 हो गई, जबकि शनिवार को 29,249 सिलेंडर पहुंचे।
- इसके बावजूद उपभोक्ताओं और कारोबारियों का कहना है कि सामान्य जरूरत पूरी करने के लिए यह आपूर्ति पर्याप्त नहीं है। गैस आयात को लेकर भी सवाल उठे हैं। राशनिंग शुरू होने के बाद नेपाल ऑयल कॉरपोरेशन ने खाना पकाने वाली गैस के आयात की मात्रा घटाई थी। अप्रैल में आयात 35 हजार मीट्रिक टन से नीचे चला गया था, हालांकि पिछले महीने से इसमें बढ़ोतरी हुई है। भारत से एलपीजी आयात में उतार-चढ़ाव का कारण नहीं बताया गया है।
- नेपाल में हर महीने करीब 45 से 46 हजार टन एलपीजी की जरूरत है और नेपाल ऑयल कॉरपोरेशन का कहना है कि लगभग इतनी ही मात्रा देश में पहुंच रही है। नेपाल में करीब 66.6 लाख घर हैं। इनमें 51 प्रतिशत परिवार खाना पकाने के लिए लकड़ी और 44.3 प्रतिशत एलपीजी का इस्तेमाल करते हैं।
- काठमांडो घाटी वाले बागमती प्रांत में करीब 15.6 लाख घर हैं और यहां एलपीजी पर निर्भरता सबसे ज्यादा है। करीब 69.8 प्रतिशत परिवार खाना पकाने के लिए एलपीजी इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में कैंपस के बाहर लकड़ी जलाकर छात्रों का खाना बनाना नेपाल के गैस संकट की गंभीरता और उसके आम लोगों की जिंदगी पर पड़ रहे असर का सीधा प्रतीक बन गया है।
आखिर गैस की कमी इतनी गंभीर क्यों हो गई?
नेपाल में पूर्वी एशिया में तनाव के बीच मार्च में एलपीजी की राशनिंग शुरू की गई थी। करीब दो महीने बाद सरकारी नेपाल ऑयल कॉरपोरेशन ने कंपनियों को बाजार में पूरे सिलेंडर भेजने का निर्देश दिया, लेकिन गैस डिपो के बाहर लंबी कतारें खत्म नहीं हुईं। स्थिति तब और खराब हो गई जब बाढ़ के कारण पृथ्वी हाईवे का एक हिस्सा रविवार से बंद है। त्रिशूली बेसिन में आई बाढ़ के कारण काठमांडो घाटी तक जरूरी सामान पहुंचाने में परेशानी हो रही है। मांग और आपूर्ति के बीच अंतर बढ़ने से कीमतों पर भी असर पड़ा है। निजी गैस कंपनियों के अनुसार, काठमांडो घाटी के बॉटलिंग प्लांट रोजाना की जरूरत का सिर्फ करीब पांच प्रतिशत ही सिलेंडर उपलब्ध करा पा रहे हैं। घाटी की रोजाना जरूरत करीब 35 से 40 हजार सिलेंडर है।