KP sharma OLI and Pushp Kamal Dahal
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नेपाल में सत्ता के लिए आपस में संघर्ष कर रहे प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पुष्प कमल दहल प्रचंड को रविवार को सुप्रीम कोर्ट से तगड़ा झटका लगा। सुप्रीम कोर्ट ने ओली और प्रचंड के पूर्ववर्ती दलों के विलय को रद्द कर दिया और दोनों दलों के विलय के बाद नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) के नाम पर भी उनका अधिकार खत्म कर दिया। एनसीपी नाम पर वास्तविक अधिकार ऋषिराम कत्याल का होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी नाम का उत्तराधिकारी ऋषिराम कत्याल को किया घोषित
जस्टिस कुमार रेग्मी और जस्टिस बाम कुमार श्रेेष्ठ ने अपने फैसले में ओली के नेतृत्व वाले कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) और प्रचंड के नेतृत्व वाले कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओइस्ट सेंटर) के विलय को रद्द कर दिया। 2017 के आम चुनाव में अपने गठबंधनों की जीत के बाद सरकार बनाने के लिए दोनों दलों ने मई 2018 में विलय कर नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के नाम से नई पार्टी बनाई।
सुप्रीम कोर्ट ने एनसीपी नाम पर अधिकार ऋषिराम कत्याल को सौंप दिया। कत्याल ने पहले ही इस नाम से चुनाव आयोग में पंजीकरण कराया हुआ था। चुनाव आयोग के मई 2018 में ओली और प्रचंड के नेतृत्व में एनसीपी नाम से दल का पंजीकरण करने के फैसले को कत्याल ने चुनौती दी थी।
विलय के लिए फिर से करना होगा आवेदन
पीठ ने अपने फैसले में कहा कि नई पार्टी चुनाव आयोग में उसी नाम से फिर से पंजीकृत नहीं हो सकती है जब पहले से उस नाम से कोई दल पंजीकृत है। कत्याल के वकील दंडपाणि पौडेल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने हमारे पक्ष में फैसला दिया है।
कोर्ट ने कहा कि नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओइस्ट सेंटर) अब विलय के पहले के चरण में लौट आए हैं। अगर उन्हें फिर से खुद की पार्टियों का विलय करवाना है तो उन्हें राजनीतिक पार्टी एक्ट के तहत चुनाव आयोग के सामने नया आवेदन करना पड़ेगा। इस फैसले का सीधा अर्थ यह हुआ कि नेपाल में अब ओली और प्रचंड की पार्टियां फिर से अलग-अलग हो चुकी हैं।
अब संसद में दोनों दल अलग माने जाएंगे
2017 के चुनाव में ओली की पार्टी 121 और प्रचंड की पार्टी को 53 सीटें मिली थी। दोनों दलों के विलय के बाद संसद में इनके सांसदों की संख्या 174 हो गई थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब फिर से दोनों दल संसद में अलग-अलग माने जाएंगे।
क्या फिर एक होंगे दोनों दल
2018 में दोनों नेताओं के बीच काफी गहरी दोस्ती थी। इसी के चलते दोनों ने अपनी पार्टियों का विलय का सत्ता हासिल की लेकिन पिछले कुछ महीनों से दोनों नेता एक दूसरे के धुर विरोधी बने हुए हैं। प्रचंड नेपाल की सत्ता से ओली को हटाने की लगातार कोशिश कर रहे हैं जबकि ओली सत्ता बरकरार रखने की पुरजोर प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में अब इसकी बहुत ही कम संभावना है कि दोनों दल फिर से विलय के लिए आवेदन करें।