म्यांमार में लोकतंत्र की प्रतीक समझी जाने वाली नेता आंग सान सू ची को दो साल की कैद सुनाए जाने को लेकर म्यांमार के सैनिक शासकों की तीखी अंतरराष्ट्रीय आलोचना हुई है। इस बीच म्यांमार के सैनिक शासन विरोधी आंदोलनकारियों ने साफ किया है कि इस सजा से उनके इरादे पर कोई फर्क नहीं पड़ा है। वे लोकतंत्र बहाली के लिए अपना संघर्ष जारी रखेंगे।
नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित सू ची को कोविड-19 संबंधी प्रतिबंधों का उल्लंघन करने के आरोप में सैनिक कोर्ट ने चार साल कैद की सजा सुनाई थी। लेकिन बाद में सैनिक शासकों ने इस सजा को घटा कर दो साल कैद कर दिया। इसके अलावा दस अन्य आरोपों में सू ची के खिलाफ सैनिक अदालत में मुकदमे चलाए जा रहे हैं। सू ची को इस साल एक फरवरी को गिरफ्तार कर लिया गया था, जिस दिन म्यांमार की सेना ने निर्वाचित सरकार के पद ग्रहण करने से कुछ घंटों पहले ही सत्ता पर कब्जा जमा लिया।
सजा सुनाए जाने के बाद सू ची को कहां रखा गया है, इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। उधर अंतरराष्ट्रीय आलोचनाओं का जवाब देते हुए सैनिक शासन के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि ‘हर व्यक्ति कानून के आगे बराबर है, कोई भी कानून के ऊपर नहीं है।’ विदेश मंत्रालय ने संयुक्त राष्ट्र पर आरोप लगाया कि उसने इस मामले में एकतरफा नजरिया अपनाते हुए अपनी राय बनाई है।
विश्लेषकों का कहना है कि सू ची की आज भी म्यांमार में व्यापक लोकप्रियता है। उनकी राय देश में मायने रखती है। लेकिन दस महीने पहले जब सैनिक तख्तापलट हुआ, तो उसके खिलाफ तब से चले आंदोलन का नेतृत्व वे नहीं कर रही थीं। ये आंदोलन आम लोग अपनी पहल पर चला रहे हैं। इसलिए उन्हें सजा सुनाए जाने से सैनिक शासन के प्रतिरोध पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। आंदोलनकारियों ने भी ऐसी ही राय जताई है।