नए सुपरनोवा से जो प्रमाण मिले हैं वह बताते हैं कि यह जरूर हमारे सूर्य जैसे दो तारों के आपस में मिल जाने के कारण बना होगा। वैज्ञानिकों के मुताबिक, ऐसी घटना का जिक्र अब तक सिर्फ सैद्धांतिक तौर पर होता आया है लेकिन पहली बार इसके प्रमाण मिले हैं। उन्हें उम्मीद है कि आगे इससे मिलते जुलते और सुपरनोवा का भी पता चलेगा जो बताएगा कि बहुत पहले हमारा ब्रह्मांड और उसका माहौल कैसा होता था।
किसी बहुत पुराने तारे के टूटने से वहां जो ऊर्जा पैदा होती है, उसे ही सुपरनोवा कहते हैं। कई बार एक तारे से जितनी ऊर्जा निकलती है, वह हमारे सौरमंडल के सबसे मजबूत सदस्य सूर्य के पूरे जीवनकाल में निकलने वाली ऊर्जा से भी ज्यादा होती है। सुपरनोवा की ऊर्जा इतनी शक्तिशाली होती है कि उसके आगे हमारी धरती की आकाशगंगा कई सप्ताह तक फीकी पड़ सकती है।
आमतौर पर सुपरनोवा के निर्माण में व्हाइट ड्वार्फ की अहम भूमिका होती है जिसके एक चम्मच द्रव्य का वजन भी करीब 10 टन तक हो सकता है। ये गर्म होते होते अचानक गायब हो जाते हैं। लेकिन कुछ गिने चुने व्हाइट ड्वार्फ दूसरे तारों से मिलकर सुपरनोवा बनाते हैं। लेकिन नए सुपरनोवा में व्हाइट ड्वार्फ तारों से न टकराकर दो तारे ही आपस में टकराए हैं। यह आज तक के इतिहास का सबसे बड़ा सुपरनोवा बना गए।