यूरो और कोपा अमेरिका फुटबॉल टूर्नामेंटों के अपनी समाप्ति के करीब पहुंचने के साथ ही अब जहां एक फुटबॉल प्रेमियों का ध्यान अगले साल होने वाले वर्ल्ड कप पर केंद्रित होगा, वहीं कतर में वर्ल्ड कप के लिए हो रहे निर्माण में आव्रजक मजदूरों के शोषण का मसला फिर चर्चा में आ गया है। 2022 के विश्व कप फुटबॉल टूर्नामेंट की मेजबानी का अधिकार कतर को 2010 में दिया गया था। ब्रिटिश अखबार द गार्जियन की एक रिपोर्ट के मुताबिक तब से वहां निर्माण कार्यों के दौरान 6,500 से ज्यादा आव्रजक मजदूरों की मृत्यु हो चुकी है।
गैर सरकारी संगठनों का आरोप है कि उनमें से ज्यादातर मजदूरों को कम मजदूरी वाले और खतरनाक ढंग के काम में लगाया गया था। साथ ही बेहद गर्म माहौल में करने के कारण भी उनकी मौत हुई। पर्यवेक्षकों कहना है कि हालांकि द गार्जियन की रिपोर्ट में यह नहीं कहा गया कि सभी 6,500 मजदूरों की मौत वर्ल्ड कप संबंधी निर्माण कार्यों में हुई, लेकिन उनमें ज्यादातर वही थे, जिन्हें इससे जुड़े कामों में लगाया गया था।
कतर के वर्ल्ड कप आयोजन से जुड़े अधिकारियों का दावा है कि उनके निर्माण कार्य के दौरान सिर्फ तीन मजदूरों की मौत हुई है। उसके अलावा इन कामों से जुड़े 35 मजदूरों की उस समय मृत्यु हुई, जब वे काम पर नहीं थे। विश्व कप टूर्नामेंट की तैयारी समिति के अध्यक्ष हसन अल थावनी ने अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से कहा कि द गार्जियन की रिपोर्ट में दिया गया 6,500 का आंकड़ा गुमराह करने वाला है। उसमें बिना संदर्भ बताए ये आंकड़ा दे दिया गया। उन्होंने कहा कि ऐसे आंकड़े देने के पहले जमीन पर जा कर तथ्य जुटाना महत्त्वपूर्ण होता है। अल थावनी ने कहा कि जिन लोगों की मृत्यु की बात उस रिपोर्ट में कही गई है, उनमें कुछ डॉक्टर और शिक्षक भी थे, जिनकी मौत प्राकृतिक कारणों से हुई।
विश्व फुटबॉल की संचालक संस्था- फीफा इस मामले में कतर के अधिकारियों के साथ है। उसने दी गई आधिकारिक संख्या को सही माना है। फीफा का दावा है कि उसने और कतर की सुप्रीम काउंसिल ने हमेशा पारदर्शिता बरती है। फीफा का दावा है कि निर्माण कार्यों के दौरान स्वास्थ्य और सुरक्षा संबंधी बेहद सख्त उपाय लागू किए गए हैँ।
लेकिन गार्जियन की उस रिपोर्ट से जुड़े पत्रकारों ने सीएनएन से कहा कि कतर में मृत्यु के कारणों के मामले में पारदर्शिता का पूरा अभाव है। वहां आम तौर पर पोस्ट मॉर्टम नहीं कराए जाते। मानव अधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कतर में आव्रजक मजूदरों की हालत में अपनी आखिरी रिपोर्ट 2013 में जारी की थी। इस बारे में सीएनएन से बातचीत करते हुए उसके प्रवक्ता ने कहा कि ज्यादातर दूसरे देशों के उलट कतर अपने यहां एमनेस्टी इंटरनेशनल की टीम को आने की इजाजत देता है। लेकिन वहां आव्रजक मजदूरों और उसके कार्य-स्थलों तक तक पहुंचना अक्सर आसान नहीं होता। मजदूरों में ऐसा भय का माहौल होता है कि वे बात करने से डरते हैं। उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने कुछ बताया, तो उसका नतीजा उन्हें भुगतना होगा।
लेकिन पर्यवेक्षकों कहना है कि बीते दस साल में सिर्फ आव्रजक मजदूरों की मौत के कारण ही नहीं, बल्कि दूसरी वजहों से भी कतर आलोचना के केंद्र में रहा है। कई मानव अधिकार संगठनों का आरोप है कि वहां आव्रजक मजदूरों को बहुत खराब स्थितियों में रखते हुए उनसे काम लिया गया है। उन्हें देर से वेतन के भुगतान और कई बार मजदूरी ना देने की शिकायतें भी सामने आ चुकी हैँ। वर्ल्ड कप करीब आने के साथ अब इन सभी मसलों पर एक बार फिर रोशनी पड़ने की संभावना है।