इस ऊर्जा का ऊष्मा के रूप में बढ़ना जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देता है, यह भी अहम बात है कि ऊर्जा कई रूप में पृथ्वी पर ही भंडार के रूप में मौजूद और संरक्षित है, जिन्हें सिंक कहा जाता है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, चंद्रमा पर उड़ने वाली धूल पृथ्वी को जलवायु परिवर्तन से बचाने में मददगार साबित हो सकती है। उन्होंने कहा कि चंद्रमा की सतह की धूल अंतरिक्ष में फैलाने से वह पृथ्वी पर आने वाले सौर विकिरण के लिए एक परत की तरह काम कर सकती है। पृथ्वी पर गर्मी और तापमान के सबसे बड़े कारक सूर्य से आने वाली रोशनी या ऊर्जा और पृथ्वी का प्रबंधन है।
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इस ऊर्जा का ऊष्मा के रूप में बढ़ना जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देता है, यह भी अहम बात है कि ऊर्जा कई रूप में पृथ्वी पर ही भंडार के रूप में मौजूद और संरक्षित है, जिन्हें सिंक कहा जाता है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण कार्बन सिंक है, क्योंकि वर्तमान जलवायु परिवर्तन की प्रमुख वजह वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ती मात्रा इसी सिंक से ही आ रही है।
सौर विकरण के लिए स्क्रीन
नए अध्ययन में एक दूसरे पहलू पर गौर किया गया है। चंद्रमा की धूल वायुमंडल में एक स्क्रीन की तरह काम कर सकती है, जिससे सूर्य से आने वाले विकरण में ही कमी हो जाएगी। शोधकर्ताओं का प्रस्ताव है कि वायुमंडल में यह धूल एक स्पेस स्टेशन से सूर्य और पृथ्वी के बीच स्थापित की जा सकती है. जिससे यह धूल स्क्रीन की तरह कार्य करेगी। बताया जाता कि इस विधि के कारण ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से काफी बचने की संभावना देखी जा रही है।
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चंद्रमा की धूल वायुमंडल में एक परत के जैसी
वैज्ञानिकों के मुताबिक, चंद्रमा की धूल वायुमंडल में एक परत की तरह काम करती है, इससे सूर्य से आने वाले विकरण में ही कमी हो जाएगी। शोधकर्ताओं का प्रस्ताव है कि वायुमंडल में यह धूल एक स्पेस स्टेशन से सूर्य और पृथ्वी के बीच स्थापित की जा सकती है। सूर्य पृथ्वी के बीच धूल-पीएलओएस क्लाइमेट में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, सौर विकिरण प्रबंधन के लिए यह अंतरिक्ष आधारित तरीका जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने का एक विकल्प दे सकते हैं। अंतरिक्ष में छोटे उपग्रहों के झुंड, जो पृथ्वी और सूर्य के बीच एल1 लैगरेंज बिंदु पर जाकर छाया प्रदान करने का काम कर सकते हैं।
विभिन्न धूल के कणों का विश्लेषण किया
उटाह यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की टीम ने विभिन्न धूल के कणों का विश्लेषण किया। इसमें यह जानने का प्रयास किया कि किस तरह की धूल इसमें कारगर हो सकती है। इसमें उन्हें काफा शानदार सफलता मिलने की बात कही जा रही है। शोधकर्ताओं का प्रस्ताव है कि वायुमंडल में यह धूल एक स्पेस स्टेशन से सूर्य और पृथ्वी के बीच स्थापित की जा सकती है. जिससे यह धूल स्क्रीन की तरह कार्य करेगी।