अमेजन के वर्षावनों से आर्कटिक वृत्त तक मूल निवासी परिस्थितिकी संरक्षण के लिये अपने पुश्तैनी ज्ञान का लाभ उठा रहे हैं जिसकी वजह से सैकड़ों और हजारों सालों से उनका अस्तित्व बरकरार है। संयुक्त राष्ट्र ने सोमवार को जैवविविधता पर अपना महत्वपूर्ण आकलन जारी किया। 450 विशेषज्ञों की टीम ने पाया कि लगातार पानी, वन्यजीव, वायु, मिट्टी और जंगलों की लूट समाज के लिए उतनी ही खतरनाक है जितना कि जलवायु परिवर्तन।
संयुक्त राष्ट्र की पहली प्रमुख वैज्ञानिक रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि “प्रकृति के ये संरक्षक” सिमट रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र का यह अध्ययन पूरी तरह स्वदेशी ज्ञान और प्रबंधन के तरीकों पर विचार करता है।
रिपोर्ट में पाया गया कि चाहे वह पेड़ों को काटने की बात हो, कृषि कारोबार हो और कटिबंधों में पशुपालन या जलवायु परिवर्तन जिसमें ध्रुवों पर वैश्विक औसत के मुकाबले दोगुनी रफ्तार से तापमान दर्ज किया जा रहा है अथवा आर्थिक बाजीगरी के लिये कोयला, तेल और गैस द्वारा प्राकृतिक दुनिया को बेरहमी से पहुंच रहा नुकसान।
रिपोर्ट के मुताबिक धरती पर मौजूद 80 लाख प्रजातियों में से 10 लाख पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है और 2014 के बाद से इंग्लैंड के आकार से पांच गुना उष्णकटिबंधीय वन नष्ट हो चुके हैं।
रिपोर्ट में कहा गया कि मूल निवासी और स्थानीय समुदाय संसाधनों के बढ़ते दोहन, खनन, परिवहन और उर्जा आधारभूत ढांचे के साथ” आजीविका और स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभावों का सामना कर रहे हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि स्वच्छ हवा, पेयजल, कार्बन डाइऑक्साइड सोखने वाले जंगल, पराग छिड़कने वाले कीड़े, प्रोटीन संपन्न मछली और तूफान रोकने वाले मैन्ग्रोव में तेजी से आ रही कमी जलवायु परिवर्तन से कम खतरनाक नहीं है।