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श्रीलंका: लंबे संघर्ष के बाद दोबारा पीएम बने विक्रमसिंघे हैं चीन विरोधी, जानें क्या है पूरा मामला

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Published by: पूजा मेहरोत्रा Updated Sun, 16 Dec 2018 03:59 PM IST
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रानिल विक्रमसिंघे

यूनाइटेड नेशनल पार्टी के नेता रानिल विक्रमसिंघे रविवार को दोबार श्रीलंका के प्रधानमंंत्री बने और उन्होंने इस पद की शपथ भी ग्रहण कर ली है। इसके साथ ही देश में 51 दिन लंबा सत्ता संघर्ष खत्म हो गया। विक्रमसिंघे का पीएम बनना भारत के लिए खुशी की बात है। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें भारत समर्थक और चीन विरोधी माना जाता है। 

26 अक्तूबर को शुरू हुआ था विवाद

राष्ट्रपति मैत्रिपाल सिरिसेना ने विवादास्पद कदम उठाते हुए 26 अक्तूबर को विक्रमसिंघे को बर्खास्त कर दिया था और उनके स्थान पर महिंदा राजपक्षे को नियुक्त किया था जिससे इस द्वीपीय देश में संवैधानिक संकट पैदा हो गया था। सिरिसेना शुक्रवार को विक्रमसिंघे से फोन पर हुई बातचीत के बाद उन्हें फिर से नियुक्त करने के लिए राजी हो गए।



राजपक्षे ने दिया इस्तीफा

महिंदा राजपक्षे ने शनिवार को इस्तीफा दे दिया जिससे विक्रमसिंघे के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया। सिरिसेना ने विक्रमसिंघे को हटाकर राजपक्षे को प्रधानमंत्री बनाया था। राजपक्षे ने पीएम बनने के 51वें दिन पद छोड़ा। श्रीलंका के किसी भी प्रधानमंत्री के कार्यकाल में केवल राजपक्षे ही ऐसे हैं जो इतने कम समय तक प्रधानमंत्री पद पर रहे। 

समर्थकों ने देशभर में किया प्रदर्शन

विक्रमसिंघे को जब राष्ट्रपति सिरिसेना ने पद से हटाया था तभी से उनके समर्थकों ने इस फैसले का विरोध करते हुए देशभर में प्रदर्शन किए। वहीं संसद में भी राजपक्षे के खिलाफ दो बार अविश्वास प्रस्ताव पास हुआ था। लेकिन राष्ट्रपति ने संसद भंग कर दी थी। जिसके बाद देश के सुप्रीम कोर्ट ने भी राष्ट्रपति के फैसले को गैरकानूनी करार दिया। 

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रानिल विक्रमसिंघे
यूनाइटेड नेशनल पार्टी के नेता रानिल विक्रमसिंघे रविवार को दोबार श्रीलंका के प्रधानमंंत्री बने और उन्होंने इस पद की शपथ भी ग्रहण कर ली है। इसके साथ ही देश में 51 दिन लंबा सत्ता संघर्ष खत्म हो गया। विक्रमसिंघे का पीएम बनना भारत के लिए खुशी की बात है। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें भारत समर्थक और चीन विरोधी माना जाता है। 

26 अक्तूबर को शुरू हुआ था विवाद

राष्ट्रपति मैत्रिपाल सिरिसेना ने विवादास्पद कदम उठाते हुए 26 अक्तूबर को विक्रमसिंघे को बर्खास्त कर दिया था और उनके स्थान पर महिंदा राजपक्षे को नियुक्त किया था जिससे इस द्वीपीय देश में संवैधानिक संकट पैदा हो गया था। सिरिसेना शुक्रवार को विक्रमसिंघे से फोन पर हुई बातचीत के बाद उन्हें फिर से नियुक्त करने के लिए राजी हो गए।

राजपक्षे ने दिया इस्तीफा

महिंदा राजपक्षे ने शनिवार को इस्तीफा दे दिया जिससे विक्रमसिंघे के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया। सिरिसेना ने विक्रमसिंघे को हटाकर राजपक्षे को प्रधानमंत्री बनाया था। राजपक्षे ने पीएम बनने के 51वें दिन पद छोड़ा। श्रीलंका के किसी भी प्रधानमंत्री के कार्यकाल में केवल राजपक्षे ही ऐसे हैं जो इतने कम समय तक प्रधानमंत्री पद पर रहे। 

समर्थकों ने देशभर में किया प्रदर्शन

विक्रमसिंघे को जब राष्ट्रपति सिरिसेना ने पद से हटाया था तभी से उनके समर्थकों ने इस फैसले का विरोध करते हुए देशभर में प्रदर्शन किए। वहीं संसद में भी राजपक्षे के खिलाफ दो बार अविश्वास प्रस्ताव पास हुआ था। लेकिन राष्ट्रपति ने संसद भंग कर दी थी। जिसके बाद देश के सुप्रीम कोर्ट ने भी राष्ट्रपति के फैसले को गैरकानूनी करार दिया। 

राजपक्षे ने बैठक के बाद पद छोड़ा

महिंदा राजपक्षे
विक्रमसिंघे को दोबारा पीएम नियुक्त करने से पहले सिरिसेना ने राजपक्षे के साथ बैठक की। इसपर राजपक्षे के समर्थक सांसद लक्ष्मण यापा ने बताया कि शुक्रवार को हुई इस बैठक के बाद राजपक्षे ने इस्तीफे का फैसला लिया। राजपक्षे के बेटे नमल का कहना है कि उनके पिता ने देश की स्थिरता के लिए पद छोड़ा है। 

राजनीतिक गतिरोध खत्म

अब विक्रमसिंघे के प्रधानमंत्री बनने से देश में चल रहा राजनीतिक गतिरोध खत्म हो गया है। जब विक्रमसिंघे को पद से हटाया गया था तो उन्होंने कहा था कि "राष्ट्रपति के पास प्रधानमंत्री को हटाने का अधिकार नहीं है। मेरे पास संसद में बहुमत है।"

वहीं राजपक्षे ने कहा था, "राष्ट्रपति का फैसला देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए जरूरी था।" विक्रमसिंघे को पद से हटाने के बाद राष्ट्रपति ने कहा था कि उन्होंने देश को संघर्ष की स्थिति से बचाने के लिए राजपक्षे को प्रधानमंत्री बनाया था। इसी फैसले के बाद देशभर में प्रदर्शन हुए थे। यहां तक कि देश की संसद भी इस हिंसा से नहीं बची। वहां भी दोनों पक्षों के नेताओं के बीच काफी लड़ाई हुई। नेताओं ने एक दूसरे के ऊपर डस्टबिन, बोतल और किताबों से हमला किया था।

राजपक्षे के पीएम बनने पर कोर्ट की भी रोक

राष्ट्रपति ने 10 नवंबर को संसद भंग कर दी थी। जिसके बाद विक्रमसिंघे ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने संसद भंग करने के फैसले को असंवैधानिक बताया। साथ ही तय समय से दो साल पहले चुनाव कराने के फैसले को भी गलत कहा। सुप्रीम कोर्ट से पहले निचली अदालत ने भी 122 सांसदों की याचिका पर सुनावई में राजपक्षे के पीएम बनने पर रोक लगा दी थी।

केवल दो ने किया पांच साल का कार्यकाल पूरा

श्रीलंका में साल 1947 में प्रधानमंत्री का पद बनाया गया था। ऐसे में 70 साल के लंबे समय में केवल दो ही प्रधानमंत्री ऐसे थे जिन्होंने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। कार्यकाल पूरा करने वाले दो प्रधानमंत्री डुडले सेनानायके और सिरिमाव भंडारनायके हैं। वहीं सिरिमाव चार बार पीएम रही हैं। सिरिमाव दो बार लगातार प्रधानमंत्री बनी थीं। अभी तक कुल 17 प्रधानमंत्री बन चुके हैं। महिंदा राजपक्षे भी दो बार प्रधानमंत्री पद पर रहे हैं। 

इस बार उन्होंने महज 51 दिनों में ही इस्तीफा दे दिया। इससे पहले वह 6 अप्रैल 2004 से 19 नवंबर 2005 तक पीएम के पद पर रह चुके हैं। अगर विक्रमसिंघे की बात करें तो वह 1993, 2001 और 2015 में प्रधानमंत्री बनाए गए हैं। 

विक्रमसिंघे, सिरिसेना और राजपक्षे 

इस पूरे विवाद में ये तीन नाम ही प्रमुख रहे। पहला विक्रमसिंघे जिन्हें पद से बर्खास्त करने के बाद आज दोबारा इस पद पर नियुक्त किया गया है। दूसरा नाम है सिरिसेना का जो देश के राष्ट्रपति हैं और जिन्होंने विक्रमसिंघे को पद से बर्खास्त किया था। और तीसरा नाम है राजपक्षे का। जिन्हें विक्रमसिंघे के स्थान पर पीएम बनाया गया था। 

इस कहानी में दो लोग ऐसे हैं जो पहले साथी और बाद में विरोधी साबित हुए। राजपक्षे जो कि 2005 से 2015 तक श्रीलंका के राष्ट्रपति भी रह चुके हैं, उनकी सरकार में सिरिसेना एक मंत्री थे। साल 2015 में सिरिसेना ने विक्रमसिंघे से गठजोड़ कर लिया और दोनों ने मिलकर राजपक्षे को चुनाव में हरा दिया।

बाद में इन दोनों (सिरिसेना और विक्रमसिंघे) के रिश्ते भी बिगड़ गए। फिर सिरिसेना ने विक्रमसिंघे को पीएम के पद से हटा दिया और आरोप लगाया कि विक्रमसिंघे ने केंद्रीय बैंक के बॉन्ड बेचे हैं। जिससे देश को 1100 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। वहीं विक्रमसिंघे ने भी बाद में आरोप लगाया कि एक कैबिनेट मंत्री उनकी हत्या की साजिश में शामिल था।
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