केन्या की अदालत ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने अमेरिकी सरकार की एक योजना पर रोक लगा दी है। अमेरिका केन्या में एक क्वारंटाइन सेंटर बनाना चाहता था। यह सेंटर उन अमेरिकी नागरिकों के लिए था, जिन्हें इबोला वायरस का खतरा है। इस योजना की खबर मिलते ही केन्या में हड़कंप मच गया। वहां के डॉक्टरों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम जनता ने इसका भारी विरोध शुरू कर दिया है।
गुपचुप समझौते को लेकर विरोध
एक अमेरिकी अधिकारी ने इस योजना की जानकारी दी थी। अमेरिका अपने संक्रमित नागरिकों को वापस बुलाना नहीं चाहता था। वह उन्हें इलाज के लिए केन्या भेजना चाहता था। लेकिन यह साफ नहीं था कि यह सेंटर केन्या में कहां बनेगा। केन्या सरकार ने भी इस पर खुलकर कुछ नहीं बोला। इस बीच अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने एक बयान दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिका केन्या को 1.35 करोड़ डॉलर यानी करीब 129.31 करोड़ रुपये की मदद देगा। यह पैसा इबोला से निपटने की तैयारी के लिए था।
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डॉक्टरों की चेतावनी के बाद कोर्ट का आदेश
इस योजना के खिलाफ नैरोबी की हाई कोर्ट में याचिकाएं लग गईं। कतीबा इंस्टीट्यूट और केन्या लॉ सोसाइटी ने इसे कोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने कहा कि इस फैसले में जनता की राय नहीं ली गई। केन्या के पास इस खतरनाक बीमारी से निपटने के लिए सुरक्षित अस्पताल भी नहीं हैं। दूसरी तरफ केन्या के डॉक्टरों ने हड़ताल की चेतावनी दे दी है। डॉक्टरों की यूनियन के अध्यक्ष डेवजी अतेल्लाह ने कहा कि अमेरिका इस बीमारी को अपनी धरती पर नहीं चाहता। वह केन्या को कचरा पेटी की तरह इस्तेमाल कर रहा है। सरकार पैसों के लिए जनता की जान खतरे में डाल रही है।
असाध्य वायरस का बढ़ता खतरा
केन्या की आम जनता भी सरकार से बहुत नाराज है। लोग कह रहे हैं कि सरकार पैसों के लालच में देश को बेच रही है। यह पूरा विवाद इबोला के बुंदीबुग्यो वायरस को लेकर है। इस खतरनाक वायरस का अभी तक कोई इलाज या टीका नहीं है। कांगो में 15 मई से अब तक 1000 से ज्यादा संदिग्ध मरीज मिल चुके हैं। वहां 220 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक असली आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा हो सकता है। अब यह वायरस पड़ोसी देश युगांडा तक भी पहुंच गया है।