राष्ट्रपति के रूप में अपनी पहली यूरोप यात्रा के लिए रवाना होते समय जो बाइडन ने कहा कि वे इस दौरे का इस्तेमाल ‘व्लादिमीर पुतिन और चीन के सामने ये साफ करने के लिए करेंगे कि अमेरिका और यूरोप मजबूती से आपस में जुड़े हैं और जी-7 आगे बढ़ने के लिए तैयार है।’ लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने जो उम्मीद दिखाई, उसकी असल जमीन उतनी मजबूत नहीं है। आज यूरोप और अमेरिका के बयानों में एक दूसरे के लिए जो सद्भावना जताई जताती है, यह उनके कदमों में जाहिर नहीं होती।
बाइडन की ये यात्रा सचमुच बेहद अहम है। इस दौरान वे ब्रिटेन में हो रहे जी-7 शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे, ब्रसेल्स में नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) की बैठक में भागीदारी करेंगे और जिनेवा में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ उनकी शिखर वार्ता होगी। लेकिन पर्यवेक्षकों का कहना है कि जहां तक चीन और रूस का मुद्दा है, यूरोप के दो बड़े देश फ्रांस और जर्मनी की राय वैसी नहीं है, जैसी अमेरिका की है। ये दोनों देश अमेरिका के नेतृत्व वाली किसी मोर्चाबंदी में हिस्सा लेने को लेकर अनिच्छुक हैं।
जर्मनी की चांसलर अंगेला मैर्केल चीन के साथ यूरोप के कारोबारी रिश्तों को मजबूत करने की पक्षधर रही हैं। यूरोपियन यूनियन और चीन के बीच हुए व्यापक निवेश समझौते के पीछे सबसे प्रमुख यूरोपीय ताकत वे ही थीं। इसके अलावा रूस से जर्मनी तक बन रही गैस पाइपलाइन नॉर्ड स्ट्रीम-2 को पूरा करने के लिए वे संकल्पबद्ध रही हैं। जर्मनी ने बाइडन प्रशासन के सामने यह साफ कह दिया है कि ये बात अमेरिका को पसंद हो या नहीं, वह इस परियोजना के अपने कदम वापस नहीं खींचेगा।
कुछ रोज पहले ही इस मामले में कदम बाइडन प्रशासन ने वापस खींचे। उसने गैस पाइपलाइन परियोजना को बना रही कंपनी पर संभावित प्रतिबंधों को माफ कर दिया। जबकि ये आम राय है कि इस परियोजना का पूरा होना रूसी राष्ट्रपति पुतिन की एक बड़ी जीत होगी। इसके जरिए यूरोप पर रूस का प्रभाव बढ़ेगा। साथ ही रूस विरोधी यूरोपीय देशों पोलैंड और यूक्रेन की स्थिति इससे कमजोर होगी। विश्लेषकों का कहना है कि नार्ड स्ट्रीम-2 परियोजना के जरिए रूस नाटो में गहरे मतभेद पैदा करने में सफल हो गया है।
उधर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी हाल में ऐसे बयान दिए हैं, जो अमेरिकी राष्ट्रपति के सार्वजनिक बयानों के उलट हैं। बीते फरवरी में मैक्रों ने यूरोपियन यूनियन को आगाह किया था कि वह चीन का मुकाबला करने के लिए अमेरिका के साथ हाथ ना मिलाए। उन्होंने कहा था ‘चीन के खिलाफ हाथ मिलाने का मतलब संघर्ष की सूरत को बढ़ाना होगा। मेरी राय में यह खुद को नुकसान पहुंचाने वाला कदम होगा।’ मैक्रों यूरोप की रणनीतिक स्वायत्तता की वकालत करते रहे हैं। इसका सीधा मतलब नीति तय करने में यूरोप को अमेरिका का पिछलग्गू बनने से रोकना है। विश्लेषकों का कहना है कि नाटो के साथ अपनी बैठक में बाइडन इस गठबंधन को फिर से प्रभावशाली बनाने की बात कहेंगे। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस सैन्य गठबंधन की लगातार उपेक्षा की थी। जबकि बाइडन मानते हैं कि रूस के खिलाफ नाटो का एकजुट होना जरूरी है।
जानकारों का कहना है कि इन मसलों से भी ज्यादा अहम आर्थिक मुद्दों पर यूरोप और अमेरिका का टकराव है। यूरोपीय देशों को शिकायत है कि व्यापार शुल्कों के मामले में बाइडन भी ट्रंप की नीति पर चल रहे हैं। वे यूरोपीय हितों की कीमत पर अमेरिका फर्स्ट की नीति को आगे बढ़ा रहे हैं। इसी तरह कोरोना वैक्सीन पर से पेटेंट हटाने का एलान उन्होंने एकतरफा ढंग से कर दिया। यूरोपीय देश इस कदम से सहमत नहीं हैं। बड़ी टेक कंपनियों पर टैक्स लगाने के प्रस्ताव पर भी यूरोपियन यूनियन और अमेरिका में सहमति नहीं है। जानकारों के मुताबिक इतनी गंभीर असहमतियों के बीच बाइडन की वो उम्मीदें शायद ही पूरी होंगी, जिन्हें जताते हुए वे अमेरिका से रवाना हुए।