क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) करार होने के बाद जापान के कारोबारी उत्साह में हैं। उनका ख्याल है कि इससे इस पूरे इलाके में व्यापार और निवेश बढ़ेगा। साथ ही सप्लाई चेन मजबूत होगी, जो कोरोना महामारी के दौरान भंग हो गई थी। आरसीईपी पर रविवार को जापान सहित 15 देशों ने एक वर्चुअल कांफ्रेंस के दौरान दस्तखत किए।
जापान में कारोबारियों के सबसे बड़े संगठन किदानरेन के अध्यक्ष हिरोआकी नाकानिशी ने यहां के अखबार जापान टाइम्स से कहा कि इस करार पर दस्तखत होना बेहद अहम घटना है। इससे मुक्त और खुला अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था कायम करने में मदद मिलेगी। यहां आधिकारिक तौर पर दी गई जानकारी के मुताबिक जापान के कुल व्यापार का 46 फीसदी अब आरसीईपी के प्रावधानों के तहत होगा।
यह पहला व्यापार समझौता है, जिसमें जापान और चीन दोनों शामिल हुए हैं। वैसे चीन जापान का सबसे बड़ा व्यापार सहयोगी है। उसका अगला बड़ा व्यापार सहयोगी दक्षिण कोरिया है। दक्षिण कोरिया भी इस समझौते में शामिल हुआ है।
इस करार के तहत चीन को जापान से होने वाले निर्यात का 86 फीसदी हिस्सा शुल्क मुक्त हो जाएगा। इसी तरह दक्षिण कोरिया को होने वाला 81 फीसदी निर्यात अब शुल्क मुक्त होगा। दक्षिण पूर्वी एशिया के दस सदस्य देशों और ऑस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैंड को होने वाले जापान के 88 फीसदी निर्यात पर अब कोई शुल्क नहीं लगेगा। इससे उन देशों में जापान में बने सामान सस्ते होंगे। जापानी कंपनियों को यकीन है कि इससे उन देशों को जापान के निर्यात में बढ़ोतरी होगी और इन कंपनियों की आमदनी बढ़ेगी।
आरसीईपी के तहत ई-कॉमर्स, बौद्धिक संपदा संरक्षण, और कस्टम आदि के बारे में समान नियमों पर सहमति बनी है। यानी ये नियम समझौते में शामिल हुए सभी देशों के बीच समान रूप से लागू होंगे। जापान चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष अकियो मिमुरा ने कहा है कि समान नियमों और शुल्क घटने के कारण जापानी कंपनियों ने एशिया में जो सप्लाई चेन कायम की है, वे अधिक व्यापक, प्रभावी और टिकाऊ हो जाएंगी। रविवार को जिन 15 देशों ने इस समझौते पर दस्तखत किए, उन्होंने भारत के इसमें शामिल होने का रास्ता खुला रखा है।
आरसीईपी में शामिल हुए देशों की निगाह भारत के बड़े बाजार पर है। इस बात का साफ जिक्र किया गया कि जब तक भारत इस करार का हिस्सा नहीं बनता, इस व्यवस्था का पूरा फायदा नहीं होगा। भारत आरंभ से आरसीईपी के लिए हो रही वार्ताओं का हिस्सा था, लेकिन पिछले साल वह इससे अलग हो गया। भारत को अंदेशा था कि इस समझौते में शामिल होने पर उसके दरवाजे चीन के उत्पादों के लिए खुल जाएंगे।
साथ ही ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से खासकर डेयर प्रोडक्ट (दुग्ध उत्पाद) बड़ी मात्रा भारत आएंगे, जिससे भारत डेयरी उद्योग को नुकसान होगा। जापान की विदेश व्यापार परिषद के अध्यक्ष केन कोबायाशी ने उम्मीद जताई है कि आरसीईपी के सदस्य भारत को समझौते में वापस आने के लिए प्रोत्साहित करेंगे, ताकि इस इलाके में सप्लाई चेन और मजबूत हो सके।
समझौते की शर्तों के तहत चीन जापानी शराब पर आयात शुल्क में अगले 21 साल के दौरान 40 फीसदी की कटौती करेगा। वह जापानी ऑटो पार्ट्स, स्टील उत्पाद और घरेलू उपकरणों पर आयात शुल्क में 87 फीसदी कटौती करेगा। जापान चीन से आने वाले कृषि और मछली उत्पादों पर 49 से 61 फीसदी तक शुल्क घटाएगा।
लेकिन चीन से आने वाले चावल, गेहूं, डेयरी उत्पाद, शक्कर, बीफ और पोर्क पर ये समझौता लागू नहीं होगा। जापानी पर्येवक्षकों का कहना है कि जैसे जापान ने ये शर्तें समझौते में जुड़वाईं, वैसे ही भारत भी उन उत्पादों के मामले में करवा सकता है, जो उसकी आम जनता की जिंदगी के लिए बेहद अहम हैं।