जापान गरीब देश होने की तरफ बढ़ रहा है। इस धनी देश के बारे में ऐसी खबर पर बहुत से लोगों को यकीन करना शायद मुमकिन ना हो, लेकिन एक ताजा किताब में दावा किया गया है कि देश में बहुत से लोगों के लिए रोजमर्रा की जिंदगी मुश्किल हो गई है। इस किताब के लेखक वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम के वित्तीय रिपोर्टर रेई नाकाफुजी हैं।
नाकाफुजी ने बताया है कि जापान के मेधावी लोग अब बेहतर तनख्वाह और कार्य-स्थितियों के लिए विदेशों में नौकरी करना पसंद कर रहे हैं। इसलिए देश धीरे-धीरे पर्यटन उद्योग पर निर्भर होता जा रहा है। 30 वर्ष पहले जापान को दुनिया का सबसे महंगा देश बताया जाता था। लेकिन अब धनी देशों से आने वाले लोगों को यहां बहुत सी चीजें काफी सस्ती महसूस होती हैं। यह देश की आर्थिक हैसियत गिरने का संकेत है।
पिछले साल देश के प्रधानमंत्री बने फुमियो किशिदा ने अब शिन्जो आबे की नीतियों को बदलने का संकेत दिया है। उनकी सरकार ने एलान किया है कि अगले फरवरी से स्वास्थ्य, बाल देखभाल और शिक्षा क्षेत्र में काम कर रहे कर्मचारियों की तनख्वाह तीन फीसदी बढ़ाई जाएगी। लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि किशिदा के लिए पुरानी नीतियों में बुनियादी बदलाव लाना संभव नहीं होगा। बल्कि एक रिपोर्ट में बताया गया है कि पूंजीपतियों ने किशिदा की नीतियों का विरोध तेज कर दिया है।
इस मुद्दे पर देश में तीखी बहस चल रही है। जापानी भाषा के प्रमुख अखबार मैनिची शिम्बुन ने पिछले साल एक संपादकीय में जापान में बढ़ रही गैर बराबरी का जिक्र करते हुए ‘आबेनोमिक्स’ पर पुनर्विचार करने की वकालत की थी।