1948 में इस्रायल के आजाद होने के बाद से यह तीसरा इस्रायल-अरब समझौता है। मिस्र ने 1979 में और जॉर्डन ने 1994 में एक-एक समझौता किया था। ऐसे में यह मानना कि दोनों देशों के बीच दोस्ती की नई इबारत कायम होगी, एकदम सटीक नहीं है। लेकिन, वर्तमान परिदृश्य में इसका महत्व कम भी नहीं आंका जा सकता।
इस समझौते को लेकर ट्रंप ने मीडिया से बात करते हुए कहा, अब जब बर्फ पिघल ही गई है तो मुझे उम्मीद है कि कुछ और अरब-मुस्लिम देश संयुक्त अरब अमीरात का अनुसरण करेंगे। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में व्हाइट हाउस में इसे लेकर एक हस्ताक्षर कार्यक्रम भी आयोजित किया जाएगा।
इस्रायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने भी इस समझौते को ऐतिहासिक करार दिया है। उन्होंने टेलीविजन पर अपने संबोधन में कहा कि वेस्ट बैंक पर कब्जा करने की योजना फिलहाल स्थगित कर दी है। हालांकि उन्होंने कहा कि इस योजना से जुड़े सभी दस्तावेज फाइलों में बंद नहीं कर दिए जाएंगे बल्कि उनके सामने ही रहेंगे।
बता दें कि अगर इस्रायल इस योजना पर आगे काम करता तो वेस्ट बैंक के कुछ हिस्सों की आधिकारिक रूप से उसके कब्जे में आने की संभावना थी। दरअसल, वेस्ट बैंक में बनाई गई यहूदी बस्तियों को लेकर इस्रायल और फलस्तीनियों के बीच विवाद बना रहा है। इस क्षेत्र में करीब 30 लाख लोग निवास करते हैं।
इनमें 86 फीसदी यानी करीब 25 लाख फलस्तीनी हैं और 14 फीसदी यानी चार लाथ 27 हजार 800 इस्रायली हैं। इनमें से अधिकतर इस्रायली बस्तियां 70, 80 और 90 के दशक में बसाई गई थीं। फलस्तीनी अपने कब्जे वाले वेस्ट बैंक, पूर्वी येरुशलम और गाजा पट्टी को मिला कर अपना एक देश बनाना चाहते हैं।
नेतन्याहू ने ऊर्जा, जल और पर्यावरण संरक्षण समेत कई अन्य क्षेत्रों में अब संयुक्त अरब अमीरात के साथ मिलकर काम करने की बात कही है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि इस्रायल दुनिया भर के लिए संकट का सबब बनी वैश्विक महामारी कोरोना वायरस की वैक्सीन विकसित करने में भी यूएई का सहयोग करेगा।
जानकारी के अनुसार आने वाले समय में दोनों देशों के बीच निवेश, पर्यटन, सीधी उड़ानों, सुरक्षा, दूरसंचार, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, स्वास्थ्य, संस्कृति, पर्यावरण, पारस्परिक दूतावासों की स्थापना और अन्य क्षेत्रों में सहयोग स्थापित करने के लिए द्विपक्षीय सौदों पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। ये कार्यक्रम अमरीका में आयोजित हो सकते हैं।
उल्लेखनीय है कि अभी तक अरब देशों के साथ इस्रायल के कोई राजनयिक संबंध नहीं रहे थे। लेकिन ईरान से संबंधित चिंताओं के चलते अब इन दोनों देशों के बीच अनौपचारिक संपर्क की शुरुआत हो गई है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार फलस्तीनी नेता कथित तौर पर इस समझौते पर हैरान हैं।
फलस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास के एक प्रवक्ता ने इस समझौते को 'सौदा' करार दिया है और कहा है कि यह राजद्रोह से कम नहीं है। फलस्तीन सरकार ने यूएई में अपने राजदूत को भी वापस बुला लिया है। वहीं, ईरान के रेवॉल्यूशनरी गार्ड्स ने भी इस्रयाल और यूएई के बीच इस समझौते को शर्मनाक बताया है।
बड़ा सवाल है वह यह है कि क्या इस समझौते के बाद बाकी खाड़ी देश भी इस तरह का रास्ता अख्तियार कर सकते हैं। यह भी अहम है कि इसमें क्या नहीं है। इस्रायल और संयुक्त अरब अमीरात को भले ही इसमें अभी या देर में लाभ मिलने की संभावना हो लेकिन फलस्तीनियों को एक बार फिर हाशिये पर रख दिया गया है।
यह समझौता फलस्तीनियों के मु्द्दे को हल करने की व्यापक शांति योजना से कहीं दूर है। नेतन्याहू को जहां इससे आम चुनाव में फायदा मिल सकता है वहीं, यूएई के लिए इसमें तात्कालिक लाभ नहीं दिख रहे हैं लेकिन अमेरिका के साथ उसके संबंध मजबूत होंगे और ईरान से भी उसे विभिन्न सहयोग प्राप्त होंगे।
इस्रायल और यूएई के बीच इस समझौते से डोनाल्ड ट्रंप काफी प्रसन्न हैं। इसे इस साल नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले उनकी विदेश नीति की जीत की तरह देखा जा रहा है। कोरोना को लेकर अपनी साख को काफी नुकसान पहुंचा चुके डोनाल्ड ट्रंप इसे चुनाव में जरूर भुनाने की कोशिश करेंगे।
यहां खास बात यह है कि कोरोना वायरस महामारी के नियंत्रण को लेकर ट्रंप और नेतन्याहू दोनों की ही आलोचना हो रही है। नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे हैं। ऐसे में दोनों ही नेता इस समझौते के सहारे अपनी राजनीतिक नैया किनारे लगाने की कोशिश करेंगे।