इस्राइल ने गाजा पट्टी पर फिर हवाई हमलों की शुरुआत कर दी है। बताया जाता है कि फिलस्तीनी गुट हमास ने भड़काऊ पर्चों का गुब्बारा इस्राइली इलाकों में भेजा। उसके जवाब में इस्राइल ने सीधे हवाई हमले बोल दिए। पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस कार्रवाई की वजह इस्राइल की अंदरूनी राजनीति में है। मंगलवार को ही इसके संकेत मिल गए थे कि इस्राइल की नई सरकार फिलस्तीनियों के प्रति अपना सख्त रुख दिखाने के लिए कोई कार्रवाई करेगी। पर्चों का गुब्बारा उसके लिए बहाना बन गया। ताजा हमलों के साथ ही मई में लगातार 11 दिन की लड़ाई के बाद लागू हुआ युद्धविराम खतरे में पड़ गया है।
तीन रोज पहले इस्राइल में नफताली बेनेट के नेतृत्व में नई सरकार बनी थी। बताया जाता है कि उससे पूर्व प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कट्टरपंथी समर्थक खफा थे। ये अंदाजा तभी लगाया गया था कि नई सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी करने के लिए वे दबाव बनाएंगे। मंगलवार को उग्र यहूदी राष्ट्रवादियों ने पूरी यरुशलम में जुलूस निकाला। इस दौरान उन्होंने यरुशलम पर यहूदियों का दावा जताया। हमास ने इसे भड़काने वाली कार्रवाई बताया। इससे तनाव बढ़ा। बुधवार तड़के हुए हवाई हमलों के बाद हमास ने कहा है कि अपने अधिकारों और यरुशलम में अपने पवित्र स्थलों की रक्षा के लिए वह अपने ‘बहादुराना प्रतिरोध’ को आगे बढ़ाएगा।
विश्लेषकों का कहना है कि जंग के नए हालात बनने से बेनेट सरकार के लिए अग्निपरीक्षा जैसी स्थिति पैदा हो गई है। बेनेट धुर दक्षिणपंथी नेता हैं, लेकिन उनकी गठबंधन सरकार में अरब आबादी के हितों की नुमाइंदगी करने वाली मंसूर अब्बास की रा‘म पार्टी भी शामिल है। साथ ही इसके पीछे मुख्य ताकत मध्यमार्गी नेता यायर लेपिड की है। लेपिड ने मंगलवार को एक ट्विट में यरुशलम में जुलूस निकालने वाले यहूदी संगठनों की आलोचना की। उन्होंने कहा कि उस जुलूस के दौरान अरबों को मार डालो जैसे नारे लगाए गए, जो इस्राइल के लोगों की गरिमा के खिलाफ है।
जानकारों का कहना है कि नेतन्याहू समर्थक कट्टरपंथी यहूदी संगठन मौजूदा सरकार के अंतर्विरोधों को भड़काना चाहते हैँ। साथ ही वे ऐसी धारणा बनाना चाहते हैं कि प्रधानमंत्री बनने के लिए बेनेट ने अपनी छवि और अपनी सोच से समझौता कर लिया। बेनेट की मुश्किल यह है कि उन्हें लेपिड और मंसूर अब्बास के समर्थकों की भावनाओं का ख्याल करते हुए आगे बढ़ना होगा। अगर लड़ाई ज्यादा भड़की, तो इन नेताओं के समर्थक नाराज हो सकते हैं। उस हालत में मौजूदा सरकार खतरे में पड़ सकती है।
लेकिन अगर बेनेट ने सख्त रुख नहीं अपनाया, तो उनके अपने समर्थक खफा हो सकते हैं और उनके राजनीतिक आधार में सेंध लग सकती है। पर्यवेक्षकों के मुताबिक अपने समर्थकों का ख्याल करते हुए ही बेनेट सरकार ने गुब्बारा भेजने का बदला लेने के लिए हवाई हमले करने का फैसला किया। इससे एक बार फिर से इस्राइल-फिलस्तीन युद्ध भड़क जाने का खतरा पैदा हो गया है।
इस्राइल और फिलस्तीनियों के बीच दशकों से चल रही लड़ाई के बीच यरुशलम का एक भावनात्मक महत्व है। इस्राइल की फौज ने 1967 में इस शहर पर कब्जा जमा लिया था। उसी समय उसने यरुशलम से जुड़े हरम अल-शरीफ पर भी कब्जा कर लिया था, जहां पर अल-अक्सा मस्जिद मौजूद है। इस मस्जिद को इस्लाम में तीसरी सबसे अधिक पवित्र मस्जिद माना जाता है। इसी मस्जिद में नमाज पढ़ने को लेकर उठे विवाद के कारण पिछले महीने 11 दिन की लड़ाई हुई थी।
यहूदी उग्रवादियों ने मंगलवार को यरुशलम और आसपास के इलाकों पर अपना अधिकार जताने के लिए जुलूस निकाला, जिस दौरान उग्र नारे लगाए गए। इससे फिलस्तीनियों की भावनाएं भी भड़की हैं। इसके बीच फिर से युद्ध भड़कने का खतरा पैदा हो गया है।