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प्रधानमंत्री पद के लिए नाम फाइनल: कितनी टिकाऊ होगी मलयेशिया में बनी नई सरकार?

Sat, 21 Aug 2021 05:47 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कुआलालंपुर

सार

पर्यवेक्षकों का कहना है कि यूएनएमओ में कई वरिष्ठ नेता मौजूद हैं। इसलिए पार्टी के अंदर इस्माइल की कभी सर्वोच्च नेताओं में गिनती नहीं हुई। शरणार्थियों पर कड़ी कार्रवाई के कारण मानवाधिकार संगठन भी उनकी आलोचना करते रहे हैं। वे फैशनपरस्त हैं। इसलिए भी समाज के कई हलकों में उनका मखौल उड़ाया जाता रहा है...
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इस्माइल साबरी याकूब - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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मलयेशिया में प्रधानमंत्री पद के लिए इस्माइल साबरी याकूब के नाम पर बनी सहमति को विश्लेषक एक आश्चर्यजनक घटनाक्रम के रूप में देख रहे हैं। साबरी यूनाइटेड मलय नेशनल ऑर्गनाइजेशन (यूएमएनओ) के नेता हैं। इस्माइल मध्य स्तरीय नेता रहे हैं। ये उम्मीद शायद ही किसी को थी कि देश के नौवें प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें चुना जाएगा। इस्माइल 61 साल के हैं। मुहिद्दीन पेरिकतन नेसिओनाल (पीएन) गठबंधन के शासन काल में वे उप प्रधानमंत्री थे। लेकिन राजनीति में अब तक उनकी हैसियत साधारण ही समझी जाती थी।

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अब इस्माइल को मामूली बहुमत के साथ सरकार चलानी होगी। संसद में बहुमत हासिल करने के लिए कुल जितने सदस्यों के समर्थन की जरूरत थी, उससे सिर्फ तीन अधिक सदस्यों ने उनके पक्ष में मतदान किया। उन्हें 114 सांसदों का समर्थन मिला। इस्माइल के नेतृत्व में सरकार बनने से यूएमएनओ की सत्ता में वापसी हो गई है। ये पार्टी 2018 के आम चुनाव में बुरी तरह हारी थी। तब करोड़ों डॉलर का एक घोटाला मुख्य चुनावी मुद्दा बना था, जिसका खामियाजा तत्कालीन सरकार को भुगतना पड़ा। उसके पहले इस पार्टी ने लगातार 61 साल तक देश पर राज किया था।

यूएमएनओ इसके पहले फरवरी में सत्ता में लौटी थी, जब उसने पीएन से निकले एक गुट के साथ मिल कर पीएन की सरकार को गिरा दिया था। तभी इस्माइल उप प्रधानमंत्री बने थे। राजनीतिक अस्थिरता के इस दौर में इस्माइल मलयेशिया में तीन साल के भीतर सत्ता में आने वाले तीसरे प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने कानून की पढ़ाई की हुई है। 2008 के बाद से यूएनएनओ की पिछली सरकारों में वे कई विभागों के मंत्री रह चुके हैं। पिछली सरकार में उन्हें कोविड-19 महामारी से निपटने का प्रभार दिया गया था। इसके लिए शुरुआत में उनके काम की सराहना हुई। लेकिन महामारी के बेकाबू बने रहने के कारण वे आलोचनाओं के केंद्र में आ गए।
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पर्यवेक्षकों का कहना है कि यूएनएमओ में कई वरिष्ठ नेता मौजूद हैं। इसलिए पार्टी के अंदर इस्माइल की कभी सर्वोच्च नेताओं में गिनती नहीं हुई। शरणार्थियों पर कड़ी कार्रवाई के कारण मानवाधिकार संगठन भी उनकी आलोचना करते रहे हैं। वे फैशनपरस्त हैं। इसलिए भी समाज के कई हलकों में उनका मखौल उड़ाया जाता रहा है।

विश्लेषकों का कहना है कि प्रधानमंत्री के इस्माइल का आकलन फिलहाल इस आधार पर होगा कि उनकी सरकार कोरोना महामारी से कितनी चुस्ती से निपट पाती है। मलयेशिया में इस समय महामारी नई लहर आई हुई है। थिंक टैंक- यूरेशिया कंसल्टैंसी ग्रुप के दक्षिण-पूर्व एशिया विश्लेषक पीटर ममफॉर्ड ने वेबसाइट एशिया टाइम्स से कहा कि इस्माइल के प्रधानमंत्री बनने से ये उम्मीद बनी है कि देश में टीकाकरण की रफ्तार कायम रहेगी। अभी तक देश में 37 फीसदी आबादी को कोरोना वैक्सीन की दोनों डोज लग चुके हैं। लेकिन ममफॉर्ड ने कहा कि इस्माइल की सरकार में कोई नयापन नहीं है। इसमें सभी पुराने चेहरे ही हैं।

कुछ जानकारों का कहना है कि मुमकिन है कि यूएमएनओ का अभी सरकार बनाना उसके लिए नुकसान का सौदा हो। देश में आम चुनाव 2022 में होने वाले हैं। अगर यूएनएमओ विपक्ष में रहते हुए चुनाव मैदान में उतरता तो उसे सरकार विरोधी भावना का लाभ मिलता। लेकिन अब उसका आकलन उसकी सरकार के कामकाज पर होगा। साथ ही जोड़तोड़ से उसके सरकार बनाने से भी कुछ मतदाता नाराज हो सकते हैं।

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