पाकिस्तान में लगातार बढ़ रही राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक मुसीबत के बीच अब पर्यवेक्षकों का ध्यान सेना की भूमिका पर टिक गया है। इस वक्त खुद सेनाध्यक्ष कमर जावेद बाजवा अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में हैं, इस कारण अनिश्चय और बढ़ गया है। जनरल बाजवा अगले महीने रिटायर्ड होने वाले हैँ।
बुधवार सुबह ये खबर आई कि पाकिस्तान के डिफॉल्टर (कर्ज चुकाने में अक्षम) होने का जोखिम बढ़ कर 52.8 प्रतिशत हो गया है। क्रेडिट डिफॉल्ट स्वैप के पांच साल के औसत के आधार पर मापे जाने वाले इस जोखिम का मतलब है कि पाकिस्तान में निवेशकों का भरोसा और घट जाएगा।
इसके पहले मंगलवार को राजनीतिक संकट को और गहरा करने वाली यह खबर आई कि पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान 28 अक्टूबर से इस्लामाबाद के लिए अपना बहुचर्चित ‘लॉन्ग मार्च’ शुरू करने जा रहे हैँ। खान ने एलान किया है कि ये मार्च लाहौर के लिबर्टी चौक से सुबह 11 मार्च शुरू होगा और इस्लामाबाद के लिए कूच करेगा। लाहौर से इस्लामाबाद की दूरी लगभग 380 किलोमीटर है।
इस बीच जनरल बाजवा की जगह कौन सेनाध्यक्ष बनेगा, इसको लेकर रहस्य अब तक बना हुआ है। पाकिस्तान में अक्सर अस्थिरता के वक्त लोगों का ध्यान सेना के रुख पर टिकता है। लेकिन फिलहाल इसको लेकर भी अनिश्चिय का माहौल है।
अपने रिटायरमेंट के बारे में सार्वजनिक एलान करने के बावजूद 62 वर्षीय बाजवा अभी हाल तक राजनीति में दखल देते रहे हैँ। आठ अक्टूबर को अपनी अमेरिका यात्रा से लौटने के तुरंत बाद उन्होंने सख्त लहजे में एक बयान जारी किया था। उसमें उन्होंने कहा था- ‘सेना किसी देश, समूह या शक्ति को पाकिस्तान को राजनीतिक या आर्थिक रूप से अस्थिर करने की इजाजत नहीं देगी।’
तब समझा गया था कि बाजवा ने पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के अध्यक्ष इमरान खान को ध्यान में रख कर ये चेतावनी दी है। लेकिन उस चेतावनी से इमरान खान पर कोई असर नहीं हुआ। अब उनके लॉन्ग मार्च के एलान को सेना की हुक्म उदूली के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि इस बीच इमरान खान और उनके समर्थकों पर घेरा कसने के संकेत मिले हैँ।
जनरल बाजवा के बयान जारी करने के कुछ ही दिनों के अंदर इमरान खान के निकट सहयोगी आजाम स्वाती को सेनाध्यक्ष के खिलाफ एक ट्विट करने के लिए हिरासत में लिया गया। स्वाती ने अपने ट्विट में जनरल बाजवा पर प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और उनके परिवार की मदद करने का आरोप लगाया था। पर्यवेक्षकों के मुताबिक बाजवा कहते रहे हैं कि सेना राजनीति में दखल नहीं देगी, लेकिन हकीकत ऐसी नहीं है।
इसीलिए हाल में इमरान खान ने एक रैली को संबोधित करते हुए सेना पर गंभीर सवाल उठाए थे। उन्होंने पूछा कि सेना का काम देश की रक्षा करना है या सियासी नेताओं की जासूसी करवाना। इस बीच पत्रकार अरशद शरीफ की केन्या में हुई हत्या के बाद जनरल बाजवा के कार्यकाल में पत्रकारों के हुए दमन की चर्चा भी जोर पकड़ गई है।
पत्रकारों की संस्था कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स के मुताबिक 2016 में जनरल बाजवा के सेनाध्यक्ष बनने के बाद से देश में 13 पत्रकारों की हत्या हुई है। जनकारों की राय है ऐसी चर्चाओं से सेना की भूमिका पर शक गहराया है। समझा जाता है कि इससे सेना के लिए बिगड़ते हालात के बीच सीधे दखल देना मुश्किल होगा। इसलिए अस्थिरता और अनिश्चय का माहौल गहराते जा रहा है।