नेपाल के केंद्रीय बैंक के ताजा आंकड़ों ने देश में चिंता बढ़ा दी है। इन आंकड़ों से साफ हुआ है कि देश के आर्थिक संकेतक (इंडिकेटर) बेहतर स्थिति में नहीं हैं। इन आंकड़ों के सामने आने के बाद अब विदेश मंत्री जनार्दन शर्मा की तरफ से हाल में किए गए दावों पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैँ। शर्मा कहते रहे हैं कि देश में कोई आर्थिक संकट नहीं है।
जबकि नेपाल राष्ट्र बैंक के मंगलवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में मुद्रास्फीति बढ़ रही है, भुगतान संतुलन का घाटा बढ़ा है, और विदेश में रहने वाले नेपालियों की तरफ से भेजी जाने वाली रकम में गिरावट आई है। राष्ट्र बैंक ने बताया है कि देश में इस वित्त वर्ष के पहले आठ महीनों में मुद्रास्फीति की औसत दर 7.14 फीसदी रही। यह उसके पहले के 67 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। सरकारी अधिकारियों ने भी स्वीकार किया है कि देश में महंगाई बढ़ रही है। लेकिन उनका कहना है कि इसकी वजह अंतरराष्ट्रीय स्थितियां हैं। खास कर अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम और खाद्य पदार्थों के बढ़े भाव का असर नेपाल में भी देखने को मिल रहा है।
नेपाल के ट्रेड एंड एक्सपोर्ट प्रोमोशन सेंटर के आंकड़ों के मुताबिक, नेपाल के आयात में सबसे बड़ा हिस्सा पेट्रोलियम का है। यह कुल आयात का 14 फीसदी हिस्सा होता है। राष्ट्र बैंक के मुताबिक बढ़ते आयात बिल के कारण देश का व्यापार घाटा भी बढ़ रहा है। इस वित्त वर्ष के पहले आठ महीनों में नेपाल का व्यापार घाटा 258.64 अरब रुपये तक पहुंच चुका है। उधर विदेश से नेपालियों की आने वाली कमाई में 1.7 प्रतिशत की गिरावट आई है।
इन ताजा आंकड़ों ने विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। त्रिभुवन यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर राम प्रसाद गयावली ने कहा है कि देश की अर्थव्यवस्था संकट की तरफ बढ़ रही है। इसकी वजह खराब हो रही अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां हैँ। उन्होंने अखबार काठमांडू पोस्ट से कहा- ‘सभी अंतरराष्ट्रीय इंडिकेटर नकारात्मक हैँ। इनमें व्यापार घाटा, बाहर से आने वाली कमाई, आयात बिल और भुगतान संतुलन शामिल हैं।’
काठमांडू यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर अच्युत वागले की भी यही राय है। उन्होंने कहा है कि देश की अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त हो चुकी है। ये दीगर बात है कि अभी ये संकट श्रीलंका के स्तर तक नहीं पहुंचा है। उन्होंने काठमांडू पोस्ट से कहा- ‘व्यापार घाटा 18 अरब डॉलर के ऊंचे स्तर तक पहुंच गया है। भुगतान संतुलन की स्थिति बिगड़ने और कर्ज का बोझ बढ़ने के भी संकेत हैँ। ये सारी बातें बताती हैं कि अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर जोखिम पैदा हो रहा है।’
वित्त मंत्री जनार्दन शर्मा ने देश में बन रहे हालात की जिम्मेदारी राष्ट्र बैंक पर डालने की कोशिश की है। उन्होंने कहा है कि बढ़ रहे कर्ज को रोकने में बैंक नाकाम रहा। प्राइवेट सेक्टर के कर्ज लेने की सीमा 19 प्रतिशत तय की गई थी। लेकिन ये कर्ज 30 प्रतिशत के ऊपर पहुंच गया। अब ये पहलू चिंता का कारण बन रहा है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को समय पर आयात को नियंत्रित करने के कदम उठाने चाहिए थे। वित्त मंत्री ने यह नहीं किया। अब वे दोष किसी और के माथे पर डाल देना चाहते हैँ।