यूक्रेन पर रूसी हमले के पहले अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने देश में बढ़ रही महंगाई के लिए कई बार बड़ी कंपनियों के बढ़ते मुनाफे को जिम्मेदार ठहराया था। तब कॉरपोरेट सेक्टर की तरफ से उनकी कड़ी आलोचना की गई थी। उधर रिपब्लिकन पार्टी ने कहा था कि ऐसे बयान देकर बाइडन अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रहे हैं।
इस रिपोर्ट के मुताबिक 2020 की दूसरी तिमाही से 2021 की चौथी तिमाही तक बढ़ी महंगाई में कॉरपोरेट मुनाफे का हिस्सा 53.9 फीसदी रहा। इसमें उत्पादन में लगने वाली सामग्रियों की बढ़ी लागत का हिस्सा 38.3 फीसदी रहा। जबकि बढ़ी मजदूरी का हिस्सा सिर्फ 7.9 फीसदी रहा। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि कोरोना महामारी के काल में कॉरपोरेट मुनाफे में असाधारण वृद्धि हुई।
रिपोर्ट के मुताबिक 1979 से 2019 तक मुद्रास्फीति दर बढ़ने के पीछे कॉरपोरेट मुनाफे का हिस्सा औसतन 11.4 फीसदी ही रहा था। इस दौरान लेबर कॉस्ट (मजदूरी) का हिस्सा 61.8 फीसदी था। लेकिन कोरोना काल में ये ट्रेंड बिल्कुल पलट गया। इस बात की पुष्टि अरबपतियों के धन में हुई अकूत बढ़ोतरी से भी होती है।
एकाउंटेबल यूएस की रिपोर्ट में अमेजन कंपनी का उदाहरण दिया गया है। इस कंपनी ने वेतन में बढ़ोतरी का तर्क देते हुए अपनी प्राइम मेंबरशिप फीस को बढ़ा दिया। जबकि असलियत यह है कि कंपनी के सीईओ एंडी जेसी को 21 करोड़ 20 लाख डॉलर का नया वेतन पैकेज दिया गया। इनमें शेयर ऑप्शन भी शामिल हैं। कुल मिला कर 2021 की तुलना में उनके पैकेज में छह गुना बढ़ोतरी हुई। यही ट्रेंड अन्य बड़ी कंपनियों में भी रहा है।
एकाउंटेबल-यूएस के अध्यक्ष काइल हेरिंग ने वेबसाइट सालोन.कॉम से कहा- ‘अति मुनाफा कमाने वाली कंपनियों में हम यह दुर्भाग्यपूर्ण रूझान देख रहे हैं कि वे अपने निवेशकों और प्रबंधकों के छोटे समूह का धन बढ़ाने में जुटी हुई हैं। ऐसा ग्राहकों और आम कर्मचारियों की कीमत पर किया जा रहा है।’
ईपीआई की रिपोर्ट में कहा गया है- ‘फिलहाल आमदनी में श्रम के हिस्से और वास्तविक वेतन में तेजी से गिरावट आ रही है। ऐसा बेरोजगारी घटने के बावजूद हो रहा है। जबकि ऐतिहासिक रूप से महंगाई के दौर में ट्रेंड इसके विपरीत रहता था। लेकिन इस बार बात अलग है।’