इंडोनेशिया में लॉकडाउन पिछले 10 जुलाई को लागू किया गया। तब तक रोजाना नए संक्रमण के 30 हजार से ज्यादा मामले सामने आने लगे थे। तब सरकार ने दूसरे देशों से ऑक्सीजन मंगाने के लिए पहल की। विशेषज्ञों का कहना है कि संक्रमण और मौत के जो आंकड़े सरकार बता रही है, वे असली सूरत नहीं बताते। अमेरिका की जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के आंकड़ों के मुताबिक देश में पॉजिटिविटी दर 27 फीसदी है। यह इस समय दुनिया की सबसे ऊंची पॉजिटिविटी दर है।
बीते शनिवार को जारी एक सर्वे में अनुमान लगाया गया कि जकार्ता की आधी आबादी कोविड-19 से संक्रमित हो चुकी है। ये संख्या सरकारी तौर पर बताई गई संख्या से 12 गुना ज्यादा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है- ‘पर्याप्त संख्या में टेस्ट न होने के कारण कई प्रांतों में असल में संक्रमित हो चुके लोगों को आइसोलेट नहीं किया जा रहा है।’ बताया जाता है कि देश के कई इलाकों में लोग कोरोना संक्रमण के लक्षणों को साधारण जुकाम या बुखार मान रहे हैं।
स्थानीय मीडिया के मुताबिक देश में कोरोना महामारी पर काबू पाने की राह में गलत सूचनाओं का प्रसार एक बड़ी बाधा है। व्हाट्सएप के जरिए देश में कोरोना के इलाज के असर और वैक्सीन के कथित दुष्प्रभावों के बारे में गलत सूचनाएं व्यापक रूप से फैलाई गई हैं। इस कारण बहुत से लोग इलाज कराने और वैक्सीन लेने में अनिच्छुक हो गए हैँ।
जानकारी के अभाव के कारण बहुत से लोग यह मान कर चल रहे हैं कि बच्चों को कोरोना संक्रमण नहीं होता। जबकि बड़ी संख्या में बच्चे इससे पीड़ित हुए हैं, जिनमें कुछ दो-ढाई महीने के शिशु भी हैं। इंडोनेशिया में बाल रोग डॉक्टरों के संघ के अध्यक्ष अमन बी पुलुंगन ने एक टीवी चैनल से कहा कि माता-पिता बच्चों को संक्रमण से बचाने के उपाय नहीं कर रहे हैं। उन्हें ये मालूम नहीं है कि बच्चे भी इससे संक्रमित हो सकते हैं।