Heron MK-II Drones: भारतीय नौसेना अब एक नए घातक ड्रोन से लैस होने जा रही है, जिसने ऑपरेशन सिंदूर में दुश्मनों को घुटने पर ला दिया था। इस ड्रोन का नाम हेरॉन MK-II है, जो भारतीय सेना और वायुसेना के पास पहले से ही मौजूद है। ये ड्रोन 35 हजार फीट की ऊंचाई तक उड़ सकता है और 45 घंटे तक हवा में रह सकता है।
'ऑपरेशन सिंदूर' में दुश्मनों के छक्के छुड़ाने वाला हेरॉन MK-II ड्रोन अब नौसेना की ताकत बढ़ाएगा। बता दें कि, भारत ने इमरजेंसी खरीद प्रक्रिया के तहत और अधिक उपग्रह-सक्षम हेरॉन MK-II ड्रोन खरीदने का फैसला किया है। ये ड्रोन पहले से भारतीय सेना और वायुसेना के पास मौजूद हैं, लेकिन अब पहली बार भारतीय नौसेना में भी शामिल किए जाएंगे। इस्राइल एरोस्पेस इंडस्ट्रीज (आईएआई) के एक अधिकारी ने बताया कि ये ड्रोन भारत की निगरानी क्षमता और दुश्मन की गतिविधियों को रियल-टाइम में ट्रैक करने की ताकत को काफी बढ़ाएंगे। उन्होंने कहा, 'भारत हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण साझेदार है। तीन दशक से भी ज्यादा समय से हमारा रक्षा सहयोग जारी है।'
87 नए ड्रोन की प्रक्रिया शुरू
सितंबर में रक्षा मंत्रालय ने 87 नए मध्यम ऊंचाई लंबी सहनशक्ति (एमएएलई) ड्रोन खरीदने के लिए निविदा जारी की थी। यह परियोजना 'मेक इन इंडिया' मॉडल पर होगी, जिसमें विदेशी कंपनियां भारतीय उद्योगों के साथ मिलकर तकनीक ट्रांसफर करेंगी। आईएआई के अधिकारी ने बताया कि हेरॉन MK-II को भारतीय सशस्त्र बलों की तीनों शाखाओं- सेना, वायुसेना और नौसेना - ने त्वरित खरीद प्रक्रिया के तहत चुना है। उन्होंने कहा, 'हम बेहद गर्व महसूस करते हैं कि तीनों सेनाओं ने हेरॉन MK-II को ऑपरेशन के लिए चुना है।'
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हेरॉन MK-II की खासियतें
यह मध्यम ऊंचाई लंबी सहनशक्ति (एमएएलई) श्रेणी का ड्रोन है। ये ड्रोन 35000 फीट की ऊंचाई तक उड़ान भर सकता है। इसके साथ ही यह लगातार 45 घंटे तक हवा में रह सकता है। इस ड्रोन का इस्तेमल दुनिया के 20 से ज्यादा देशों में किया जाता है। यह ड्रोन सीमाओं पर निगरानी, आतंकवाद-रोधी अभियान, दुश्मन की गतिविधियों की पहचान और समुद्री सुरक्षा मिशनों में बेहद कारगर माना जाता है।
भारत में बनाने की तैयारी
इस्राइली अधिकारी ने बताया कि कंपनी 'मेक इन इंडिया' के तहत स्थानीय स्तर पर निर्माण की तैयारी कर रही है। इसके लिए एचएएल और ईएलकॉम जैसी भारतीय कंपनियों के साथ साझेदारी हो चुकी है। उन्होंने कहा, 'हम चाहते हैं कि भविष्य में हेरॉन का भारतीय संस्करण बने, जिसमें 60% तक स्वदेशी सामग्री हो।'
ड्रोन युद्ध में भविष्य का बदलाव
अधिकारी ने बताया कि 1973 के युद्ध के बाद इस्राइल ने महसूस किया कि इंटेलिजेंस के लिए सिर्फ दूसरों पर निर्भर रहना गलत था। इसी सबक के बाद पहला ऑपरेशनल ड्रोन स्काउट बना और आज यूएवी युद्ध क्षेत्र में 'क्वीन ऑफ बैटलफील्ड' मानी जाती है। उन्होंने कहा, 'आज ड्रोन हजारों किलोमीटर दूर से दुश्मन पर नजर रखते हैं, मल्टी सेंसर सिस्टम चलाते हैं और एयर डिफेंस सिस्टम तक को मात देते हैं।'