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चीन में उत्पादन बंद करने वाली कंपनियों को नहीं लुभा रहा भारत

Tue, 08 Oct 2019 03:02 AM IST
देव कश्यप वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला

सार

  • 56 कंपनियों ने 17 महीने में चीन में बंद किया उत्पादन, लेकिन सिर्फ 3 ने भारत का किया रुख
  • अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव गहराने से चीन से लगातार महंगा होता जा रहा निर्यात
  • चीन के बाद दुनिया का दूसरा बड़ा उपभोक्ता बाजार है भारत, 2030 तक निकलेगा सबसे आगे
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विस्तार
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अमेरिका और चीन के बीच चल रहे व्यापार युद्ध के चलते भले ही बड़ी कंपनियां चीन छोड़ने को मजबूर हो रही हों, लेकिन फिलहाल इसका फायदा भारत को होता नहीं दिख रहा है। अप्रैल, 2018 और अगस्त, 2019 के बीच चीन से अपना उत्पादन दूसरे देशों में ले जाने वाली 56 कंपनियों में से महज तीन कंपनियों ने भारत का और दो ने इंडोनेशिया का रुख किया है। जापान के वित्तीय समूह नॉमुरा के एक अध्ययन में ये बातें सामने आई हैं।

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इस बदलाव का सबसे ज्यादा फायदा वियतनाम को मिला है। यहां 56 में से 26 कंपनियों ने अपना उत्पादन शिफ्ट किया है। इसके अलावा 11 कंपनियों ने ताइवान और आठ ने थाईलैंड का रुख किया है। चीन से होने वाले निर्यात पर अमेरिका द्वारा कर लगाए जाने से दोनों देशों के बीच विवाद लगातार गहरा रहा है और अमेरिकी आयातकों के लिए चीनी सामान खासा महंगा पड़ रहा है। कई कंपनियों ने चीन मेें अपना विनिर्माण परिचालन समेट दिया है और कई इसकी तैयारी कर रही हैं।

दुनिया की दो बड़ी आर्थिक ताकतों के बीच टकराव के चलते चीन में कंपनियों के लिए लागत खासी बढ़ गई है। हालांकि, उत्पादन शिफ्ट किए जाने को लेकर अनिश्चितता के कारण कई कंपनियां अभी भी कोई कदम उठाने से संकोच कर रही हैं। बीते साल अमेरिका ने चीन से आयात होने वाले कई उत्पादों पर कर लगाया था।
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विनिर्माण इकाइयों को दूसरे देशों में ले जाना कोई छोटी बात नहीं है। लागत में बढ़ोतरी से पार पाने के अलावा कंपनियों को बुनियादी ढांचे, संचार और संपर्क जैसी सुविधाओं पर भी गौर करना होता है। अच्छे और किफायती भंडारण, परिवहन और अन्य लॉजिस्टिक सेवाओं भी कंपनियों के लिए अहम हो जाती हैं। यह तो सिर्फ शुरुआत है। कुशल कार्यबल तलाशना और फिर नए कामगारों को उत्पादन प्रक्रिया से जुड़े किसी खास काम के लिए प्रशिक्षण दिलाना भी खासा चुनौतीपूर्ण होता है। इसके अलावा कंपनियां सरकारी सहयोग, अनुकूल कर प्रणाली और कानूनी ढांचे, एक नए देश में कारोबार शुरू करने में लगने वाले समय पर भी गौर करती हैं।

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इन मामलों में चीन पर भारी पड़ता है भारत

कुल मिलाकर दुनिया में बनने वाले कुल सामान के 20 फीसदी का निर्माण करने वाले प्रतिस्पर्धी चीन की तुलना में भारत और इंडोनेशिया में आदर्श जनसांख्यिकी मौजूद है। पहली बात यह है कि दोनों देश आबादी के मामले में क्रमश: दुनिया में दूसरे और चौथे पायदान पर हैं।

वहीं भारत आबादी के मामले में 2030 तक चीन को पीछे छोड़ सकता है। वहां तुलनात्मक रूप से आबादी खासी युवा है। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि भारत में नागरिकों की औसत उम्र 30 साल, इंडोनेशिया में 31 साल है। इसकी तुलना में चीन के नागरिकों की औसत उम्र 40 साल है। चीन की तुलना में भारत की श्रम लागत लगभग आधी पड़ती है।

...तो भारत को क्यों नहीं मिल रहा फायदा

ऐसे में सवाल उठता है कि भारत और इंडोनेशिया को कंपनियों के चीन में कारोबार समेटने का फायदा क्यों नहीं मिल रहा है। अर्थशास्त्री इस बात पर सहमत हैं कि चीन की तुलना में भले ही भारत और इंडोनेशिया की जीडीपी विकास दर ज्यादा है, लेकिन ये दोनों ही देश अभी विनिर्माण क्षेत्र में पर्याप्त विदेशी निवेश (एफडीआई) लुभाने में नाकाम रहे हैं। इसीलिए इन्हें अभी तक ‘सोती हुई ताकत’ कहा जाता है। एफडीआई से आर्थिक सुधारों पर विदेशी निवेशकों के भरोसे का संकेत मिलता है।
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