इन मामलों में चीन पर भारी पड़ता है भारत
कुल मिलाकर दुनिया में बनने वाले कुल सामान के 20 फीसदी का निर्माण करने वाले प्रतिस्पर्धी चीन की तुलना में भारत और इंडोनेशिया में आदर्श जनसांख्यिकी मौजूद है। पहली बात यह है कि दोनों देश आबादी के मामले में क्रमश: दुनिया में दूसरे और चौथे पायदान पर हैं।
वहीं भारत आबादी के मामले में 2030 तक चीन को पीछे छोड़ सकता है। वहां तुलनात्मक रूप से आबादी खासी युवा है। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि भारत में नागरिकों की औसत उम्र 30 साल, इंडोनेशिया में 31 साल है। इसकी तुलना में चीन के नागरिकों की औसत उम्र 40 साल है। चीन की तुलना में भारत की श्रम लागत लगभग आधी पड़ती है।
...तो भारत को क्यों नहीं मिल रहा फायदा
ऐसे में सवाल उठता है कि भारत और इंडोनेशिया को कंपनियों के चीन में कारोबार समेटने का फायदा क्यों नहीं मिल रहा है। अर्थशास्त्री इस बात पर सहमत हैं कि चीन की तुलना में भले ही भारत और इंडोनेशिया की जीडीपी विकास दर ज्यादा है, लेकिन ये दोनों ही देश अभी विनिर्माण क्षेत्र में पर्याप्त विदेशी निवेश (एफडीआई) लुभाने में नाकाम रहे हैं। इसीलिए इन्हें अभी तक ‘सोती हुई ताकत’ कहा जाता है। एफडीआई से आर्थिक सुधारों पर विदेशी निवेशकों के भरोसे का संकेत मिलता है।