संयुक्त राष्ट्र विकासशील देशों की मजबूत आवाज बनते हुए भारत ने सुरक्षा परिषद और वैश्विक संस्थाओं में व्यापक सुधार की पुरजोर मांग रखी। भारत ने कहा कि मौजूदा वैश्विक ढांचा पुराना हो चुका है और इसमें अफ्रीका सहित विकासशील देशों को स्थायी प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। पढ़िए रिपोर्ट-
भारत ने फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर दुनिया के विकासशील देशों का नेतृत्व करते हुए संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के ढांचे में व्यापक सुधार की पुरजोर वकालत की है। न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित उच्चस्तरीय बैठकों के दौरान भारत ने कहा कि वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में विकासशील देशों को उचित प्रतिनिधित्व मिलना अनिवार्य है।
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सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज ने राष्ट्रीय वक्तव्य देते हुए कहा कि सुरक्षा परिषद का वर्तमान स्वरूप आज की वा स्तविकताओं से कोसों दूर है। इसमें तत्काल सुधार समय की मांग है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के अनुसार जॉर्ज ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस से मुलाकात की। इस दौरान भारत ने बहुपक्षवाद के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता दोहराई। अंतर्सरकारी वार्ता (आईजीएन) के दौरान भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के विस्तार पर विशेष जोर दिया। उन्होंने मांग की कि स्थायी सदस्यता की श्रेणी में विकासशील देशों और विशेषकर अफ्रीकी देशों को स्थान दिया जाए।
हम विकासशील देशों की मदद के लिए प्रयासरत
रणधीर जायसवाल ने सोशल मीडिया पर इन वार्ताओं की जानकारी देते हुए बताया कि भारत इंडिया-यूएन डेवलपमेंट पार्टनरशिप फंड और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई) जैसे माध्यमों से विकासशील देशों की मदद के लिए निरंतर प्रयासरत है। भारत का रुख स्पष्ट है कि जब तक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में सुधार और समावेशी नीतियां नहीं आएंगी, तब तक वैश्विक विकास का लक्ष्य अधूरा रहेगा। यह भारत के उस संकल्प को दर्शाता है, जहां वह विश्व मंच पर केवल अपनी नहीं, बल्कि पूरी विकासशील दुनिया की सशक्त आवाज बनकर उभरा है।
जॉर्ज ने कहा कि भारत के सुधार मॉडल और अफ्रीकी मॉडल के बीच समानता को दर्शाते हुए समावेशी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो। ईकोसॉक फोरम 2026 में भारत ने वैश्विक वित्तीय प्रणालियों में भी आमूल-चूल परिवर्तन की मांग की। भारत ने चेतावनी दी कि सतत विकास लक्ष्यों को पाने के लिए 4 ट्रिलियन डॉलर के वित्तीय अंतर को पाटना जरूरी है।